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बुद्धिमान वजीरपुत्र

बुद्धिमान वजीरपुत्र एक शाहजादा और एक वजीर का पुत्र बड़े घनिष्ठ मित्र थे। एक दिन शाहजादे ने अपने मित्र से कहा - मित्र , आज रात मैंने स्वप्न...

बुद्धिमान वजीरपुत्र

एक शाहजादा और एक वजीर का पुत्र बड़े घनिष्ठ मित्र थे। एक दिन शाहजादे ने अपने मित्र से कहा - मित्र , आज रात मैंने स्वप्न में एक अभूतपूर्व सुन्दरी शाहजादी को देखा है। वह एक बाग में टहल रही थी। उस बाग में एक से एक बढ़िया सुन्दर , कोमल और महकते हुए फूल थे। शाहजादी उन फूलों से भी अधिक सुन्दर थी । उसने मेरी ओर एक नजर डाली पर बोली कुछ भी नहीं। दोस्त ! उसे अपना बनाने के लिए मैं तरस रहा हूं। मैं क्या करूं ?

वजीर का पुत्र यद्यपि उम्र में छोटा था तो भी वह बड़ा बुद्धिमान था । वह किसी भी कठिनाई का हल निकाल ही लेता था । उसने मित्र की दशा देख कर पूछा - अच्छा , तो मित्र यह बताओ तुम्हें वह दिशा मालूम है , जहां तुमने उसे देखा।

वाह यह भी कोई बात है ? मुझे उस रास्ते का एक - एक मोड़ याद है , जिस रास्ते से मैं स्वप्न में वहां पहुंचा था। शाहज़ादे ने उत्तर दिया।

सुन कर वजीर का पुत्र बोला - तो फिर क्या बात है । हम उसका पता जरूर लगा सकेंगे । आप निश्चिन्त रहें मित्र । हम कल सुबह ही किसी को बताएं या पता दिए बिना उसकी खोज में चल देगे और उसे हूंढ ही निकालेंगे ।

दूसरे दिन सुबह सवेरे ही दोनों मित्र घोडो पर सवार होकर शहर से चल दिए । शाहजादा राह दिखाता गया और वजीर पुत्र उसके पीछे - पीछे चलता गया । सायकाल को वे एक सुन्दर नगर में पहुंचे । इसमें जगह - जगह पर सुन्दर उद्यान बने हुए थे । वे सड़कों पर आगे बढ़े तो सामने शाही बाग दिखाई दिया । वे घोड़ों पर से उतर पडे और पहरेदारों की नजर बचा कर , ज्यों - त्यों करके बाग में घुस गए।

शाहजादी भी उसी समय बाग में टहल रही थी । ज्यो ही शाहजादे ने उसे देखा तो वह बड़ा प्रसन्न हुआ । शाहजादी की नजरें भी शाहजादे पर पड़ी । उसने एक सुन्दर सा फूल हाथ में लिया और उसे बड़ी लापरवाही से सूघने लगी । उसने इन दोनों मित्रो की ओर मुस्करा कर ताका पर जबान से कुछ भी न बोली । यह देख शाहजादा और भी बेकरार हो गया । उस शाहजादी ने हाथ में लिया हुआ फूल उनकी ओर फेंका , अपने सुनहरे बालों को संवारा और वहां से अठखेलिया करती हुई चली गई।

अपने मित्र शाहजादे को वजीर पुत्र ने समझा कर बाग से निकल चलने को राजी किया । उसने उसे यह भी कहा - मित्र घबराने की कोई बात नहीं । मुझ पर विश्वास रखो , मैं शाहजादी को एक दिन तुम्हारे पास ले ही आऊंगा । तुम केवल धीरज रखो।

इसके बाद वे वहां से चल दिए । उसके बाद वे एक सराय में रहने लगे।

वजीरजादे ने दूसरी सुबह शहर में जा कार शाही नानबाई के पास नौकरी कर ली । वहां उसने कुलचे बनाने शुरू किए । उसने शाहजादी के पास भेजे जाने वाले कुल्चे बड़े ही सुन्दर बनाए । जब नानबाई कुलचे लेकर शाहजादी के पास पहुंचा तो वह इन्हें देख कर बहुत प्रसन्न हुई और बोली - अरे , आज के कुलचे तो बहुत ही बढ़िया हैं । यह तो तुम्हारे हाथ के नहीं हैं।

नानबाई ने उत्तर दिया - शाहजादी साहिबा , आप का कहना ठीक ही है । कल ही मैने । एक गरीब पर तरस खा कर उसे अपने यहा नौकर रखा है । यह उसी के हाथो की कारीगरी है । और उसने इन्हें सिर्फ आपके लिए ही बनवाया है।

शाहजादी को इन कुलचों के स्वाद ने इतना मस्त किया कि वह एक दम बोल उठी - नानबाई ! जाओ जल्दी से उसे मेरे सामने हाजिर करो । मैं भी तो देखू वह है कौन ?

नानबाई की पोशाक पहने हुए वजीरपुत्र जब शाहजादी के सामने पेश हुआ , तो उसने उससे एक के बाद एक न मालूम कितने प्रश्न पूछे । उसने भी बड़ी चतुराई से उत्तर दिए । सांकेतिक भाषा में ही उसने शाहजादी को अपने मित्र के बारे में सब बातें बता दी । उसने उसे यह भी कह दिया कि वह उसके दर्शनमात्र के लिए तडप रहा है । उसने कहा - शाहजादी साहिबा , मुझे भय है कि वह आपके प्रेम के रोग में जान न खो बैठे । उसे आपकी एक मुस्कान भरी नजर ही बचा सकती है।

शाहजादी बड़ी नरम दिल थी । वह यह मान गई और बोली - अगर तुम्हारा मित्र मेरे दर्शन मात्र है स्वस्थ होगा तो चलो मैं आज आधी रात को , सराय में स्वयं जाकर उसे दर्शन दूंगी।

वजीरपुत्र ने जब यह बात शाहजादे से कही तो उसकी खुशी की सीमा न रही । यह समाचार पाकर बह इतना आनन्द विभोर हो उठा कि जब आधी रात को शाहजादी उसके कमरे में पहुंची तो वह सो रहा था । उसकी आंख तब खुली जब सूर्य चढ़ आया । जब वह आखें मलता हुआ जागा तो उसे शाहजादी के आने की बात याद आई । वह रोता हुआ अपने मित्र के पास गया और बोला - हाय हाय ! मित्र ! शाहजादी तो न आई । उसने झूठा वायदा किया।

वजीर के पुत्र को इस बात पर विश्वास न हुआ । उसने शाहजादे को समझा बुझा कर शान्त किया । इसी बीच उसने शाहजादे की जेब में हाथ डाला । उसमें से उसने एक रूमाल और पांच छोटी सी खेलने की गोलियां निकाली । रूमाल पर शाहजादी का नाम लिखा हुआ था । यह देख उसने कहा - मित्र ! तुम यह क्योकर कहते हो कि शाहजादी झूठी है । यह देखो । वह आई तो थी पर तुम गहरी नींद सो रहे थे । नहीं तो तुम्हारे रूमाल के बदले उसका यह रूमाल तुम्हारी जेब में क्योंकर पहुंच जाता ?

शाहजादे ने अपनी गलती मानते हुए कहा - पर मित्र अब क्या होगा , और यह गोलियां उसने क्यों रखी है?

बड़े भोले हो शाहजादे साहब । उसने उत्तर दिया । यह गोलिया उसने आपको यह बताने के निमित्त रखी हैं कि आप अभी इनसे खेलने योग्य बच्चे ही हो । प्रेम करने योग्य नहीं।

अपने मित्र को तड़पते देख कर उसके मन में दया उत्पन्न हुई और बोला - अच्छा तो आप न घबराइए । मैं एक बार फिर यत्न करके देखूगा कि क्या हो सकता है । वह आएगी और जरूर आएगी । उसे भी आपसे प्रेम हो गया है नहीं तो वह अपना रूमाल न छोड़ जाती।

वजीरपुत्र दूसरे दिन फिर नानबाई के वेश में शाहजादी के पास गया । उसने फिर शाहजादी की मिन्नत की और उसे केवल एक बार फिर सराय में आने को राजी कर लिया । उस रात शाहजादा आंखों में मानो मिर्च लगा कर जागता रहा । आधी रात को शाहजादी सराय में उसके पास आई । वह सिर से पांव तक सौन्दर्य का प्रतीक सी लगती थी । सारी रात बातें करते सुख चैन से कट गई।

पर भाग्य ने इन प्रेमियों का साथ न दिया । उसी समय वहां का वजीर , उस कूचे से गुजरा । उसने जब शाहजादी की हँसी सुनी तो वह सशक होकर उस कमरे की खिड़की के पास गया । वहां पर राजपुत्री को देख वह क्रोध से थरथर कांप उठा । वह सीधे कमरे में घुस गया और कड़क कर बोला - यहां क्या खिचड़ी पक रही है , शाहजादी साहिबा ? साथ ही उसने सिपाहियों को इशारा किया । उन्होंने शाहजादे और शाहजादी दोनों को पकड़ लिया और ले जाकर जेल में डाल दिया।

सरायवाले ने जब वजीरपुत्र को यह खबर दी तो वह दुखी हो कर हाथ मलने लगा । पर धीरज रख कर वह शाहजादे को मुक्त कराने के लिए कोई उपाय सोचने लगा । सुबह होते ही उसने एक बुढ़िया का वेश बनाया और लाठी टेकता हुआ जेल के द्वार पर पहुंचा । वह अपने साथ एक छोटी सी टोकरी में कुछ कुलचे भी ले गया । जब जेल के द्वार पर पहरेदारों ने उसे रोका तो वह बुढ़िया रूपी वजीर पुत्र बोला - बेटो , मैं इन बेचारे गरीब आदमियों को , जो यहां बंद हैं रोटी देने आई हूँ । क्या तुम उन पर दया न करोगे । मुझे उन्हें रोटी तो देने दो । पहरेदारों को भी कैदियों पर तरस आया और उन्होंने बुढ़िया को अन्दर जाने दिया।

अन्दर जाकर वह सीधे अपने मित्र और शाहजादी की कोठरी में पहुंचा । उसने अपना पहनावा शाहजादी को पहनाया , और उसकी पोशाक अपने आप पहन ली । उसके बाद अब बुढ़िया का वेश धारण किए शाहजादी टोकरी लेकर जेल से बाहर चली गई । वह आन की आन में अपने कमरे में ज्यों - त्यों करके पहुंची और ईश्वर को धन्यवाद देने लगी।

दो घण्टे बाद वजीर मूछों पर ताव देता हुआ बादशाह को जेल में इसलिए लाया ताकि वह अपनी पुत्री करतूत देखे । उसने बड़े जोश से शाहजादी वेशधारी वजीर पुत्र की ओर उंगली उठा कर कहा - यह लीजिए सरकार ! यह रही हमारी शाहजादी।

बादशाह ने उसके मुख पर से पर्दा हटाया । उसके मुंह को गौर से देखा और क्रोध की मूर्ति बन कर कहा - कमबख्त कहीं के । तुम्हारी यह हिम्मत कि इस तरह मेरी बेटी और मेरे खानदान के नाम पर कालिख पोतो।

उसने आव देखा न ताव , और तलवार खोच कार , एक बार में ही वजीर का सिर काट दिया । उसका धड वहीं तड़पने लगा।

शाहजादे और वजीर पुत्र को जेल से मुक्त कर दिया गया और वे भाग कर उसी सराय में चले गए । वहां पहुंच कर उन्हें पता चला कि शाहजादी का विवाह भी अब शीघ्र ही होने वाला है । उसकी सगाई पहले ही हो चुकी थी । शाहजादी के न मानने पर भी उसे एक ऐसे आदमी से ब्याहा जा रहा था जो उसे पसन्द न था । इसके साथ ही उसी दिन से शहर को भी दुल्हन की तरह सजाया जाना शुरू हुआ।

वजीरपुत्र ने फिर एक बार कुलचे लेकर शाहजादी के पास जाने की अनुमति चाही। वह निराश होकर शाहजादी के सामने गया। उसने शाहजादी के साथ सोच - विचार करके एक तरकीब निकाल ली और दोनों उस पर अमल करने की सोची।

विवाह की रात आ पहुंची । शादी की सभी रस्में पूरी हो गई और सुबह को शाहजादी की डोली उठी । चारों ओर शहनाई और नफीरी बज रही थीं और खुशियां मनाई जा रही थी । बाराती दुल्हन को लेकर रवाना हुए।

सायंकाल को वे एक घने जंगल में बहती हुई नदी के पास रुके । बस उसी समय , जबकि वे लोग तम्बू आदि खड़े करने में लगे थे , वजीर का पुत्र शाहजादी की डोली में घुसा । उसने सिर से पांव तक लम्बा बुर्का पहना हुआ था । वहीं बुर्का पहने हुए शाहजादी डोली से निकल कर उस जगह पहुची जहां उसका प्रिय शाहजादा उसकी प्रतीक्षा कर रहा था । दोनों घोड़े पर सवार हो कर अन्धेरे में ही चल पड़े।

अब सुनिए , बजीरपुत्र की बात । ज्यों ही शाहजादी डोली से निकली त्यो ही उसकी ननद उस डोली में उसके मनबहलावे के लिए चली गई । आप जानते ही हैं कि वजीरपुत्र की बातों से पत्थर का सा दिल भी पिघलता था । उसने जब देखा कि एक और शाहजादी अन्दर आ गई है , उसने उसे वश में करने का जाल बिछाया । इससे पूर्व कि बाराती तम्बू गाढ़ चुके , वजीरपुत्र ने उसे भी अपने साथ विवाह करने पर राजी कर लिया । अत . अन्धेरे का सहारा लेकर वे दोनों भी वहां से रफूचक्कर हो गए । कुछ ही देर में वे भी शाहजादे के पास पहुंच गए।

वे रात भर सफर करते हुए दूसरे दिन सुबह ही अपने नगर में पहुंच गए । इनके फिर से घर लौट आने की खुशी में नगर में खुशियां छा गई । और जब उन्हें यह पता चला कि दोनों अपनी इच्छा के अनुसार विवाह भी कर लाए हैं तो सारी जनता और भी प्रसन्न हो गई।

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