धूर्त दरवेश का अंत एक समय कश्मीर में एक दरवेश रहता था । वह दरवेश तो नाममात्र का था । वास्तव में वह था बड़ा ही दुष्ट और धूर्त । लोग उसे फकी...
धूर्त दरवेश का अंत
एक समय कश्मीर में एक दरवेश रहता था । वह दरवेश
तो नाममात्र का था । वास्तव में वह था बड़ा ही दुष्ट और धूर्त । लोग उसे फकीर मान
कर उसकी बड़ी खातिर करते थे । उसके बहुत शिष्य हो गए थे और आए दिन उसकी झोपड़ी के
बाहर लोगों की भीड़ लगी ही रहती थी।
एक दिन उसके पास उसका एक शिष्य अपने दिल की बात
कहने के लिए आया । उसने दरवेश के चरण छू कर उससे सहायता की प्रार्थना करते हुए कहा
- गुरुदेव ! आप जानते हैं कि मैं गरीब हूँ । मेरी पुत्री विवाह योग्य हो चुकी है
पर मैं उसके विवाह का खर्च पूरा करने में असमर्थ हूं । भला कोई मुझ गरीब की लड़की
से विवाह करने को क्यों तैयार होगा।
यह सुनकर दरवेश एक दो मिनट तक ऐसे बैठा रहा
मानो वह कुछ सोच रहा हो । उसके बाद उसने उत्तर दिया - अच्छा , तुम
अब घर चले जाओ । सब कुछ ठीक हो जाएगा । अल्लाह बड़ा ही रहीम है । मैं कल तुम्हारी
पुत्री के लिए दुआ करूगा।
दूसरे दिन वह गरीब दरवेश को अपने घर के द्वार
पर आते हुए देख बहुत हैरान हो गया और अपने को भाग्यवान मानने लगा । घर को दरवेश के
कदमों से पवित्र होते देख कर सभी घर वाले खुश हुए । उन्होंने उसे बिठलाने के लिए
घर का एकमात्र फटा पुराना कालीन बिछाया । सारा घर दरवेश का सत्कार करने में जुट
गया । उसे पीने को शरबत दिया और अच्छा भोजन खिलाया गया । भला वे ऐसा क्यों न करते
उनके यहां नगर का माना हुआ दरवेश आया था।
जव दरवेश कुछ देर आराम कर चुका तो वह गरीब आदमी
अपनी पुत्री को उसके पास ले गया । उस युवती ने दरवेशा के चरण छुए और नीचे बैठ गई ।
दरवेश ने उसके सिर पर हाथ रख कर आशीष दिया।
जब लड़की और कमरे में उपस्थित सभी लोग वहां से
चले गए तो दरवेश ने शिष्य से कहा - सुनो अजीज ! तुम बहुत गरीब हो , लेकिन
तुम्हारी पुत्री बड़ी भाग्यवती है । उसके रूप के योग्य एक सुन्दर पति अवश्य मिलेगा ।
घबराओ नहीं , अल्लाह
बडा रहम दिल है । उसकी माया वह ही जाने । हम सांसारिक लोगों को उस पर , और उसको इच्छाओं पर अटल विश्वास रखना
चाहिए । कल रात मुझे जो पता चला और अल्लाह का आदेश मिला , तुम उस पर अमल करोग तो सब ठीक होगा ।
सुनो , दिल मजबूत बनाकर
और उस सर्वशक्तिमान पर अटल विश्वास रखकर उसके हुक्म पर काम करो । अपनी पुत्री को
लकड़ी के एक बड़े सन्दुक में बंद करके उस पर मुहरबंद ताला लगाओ । फिर सांयकाल
उठाकर उसे नदी में बहा दो । इस तरह तुम्हारी पुत्री अपने अजललोन ( भाग्य के अनुसार
पति ) के पास स्वयं पहुंच जाएगी । तुम स्वयं रात भर कमरे में बंद रहकर दुआ करते
रहो और किसी की न सुनो।
यह है तुम्हारी पुत्री का भाग्य । यह कहकर
दरवेश आशीर्वाद देकर चल दिया।
आपको समझने में देर न लगी होगी कि वास्तव में
दरवेश कोई संत या भद्र पुरुष न था । वह एक धूर्त था और उसका इरादा लड़की के प्रति
नेक नहीं था।
उस गरीब की लड़की का नाम फातिमा था । वह बडी
शीलवती और सुन्दर थी । जब दरवेश ने उसे देखा तो उसका मन उसके रूप लावण्य पर मोहित
हो उठा । उसने उसी समय मन ही मन प्रण किया कि चाहे जिस तरह से भी हो , मैं
इसे अपनी बीबी बनाकर रहूंगा । इसीलिए उसने यह षडयन्त्र रचा।
ज्यों ही वह दरवेश अपनी कुटिया में लौटा तो
उसने अपने मुरीदों ( शिष्यो ) को एकत्र किया और उन्हें आज्ञा दी - अजीजो ! कल
तुम्हें एक जरूरी काम करना है । कल सायंकाल के समय हमारी इस नदी में बहता हुआ एक
लकड़ी का सन्दुक पहुंचेगा । उसमें शैतान बन्द कर दिया गया है । तुम उधर उस पुलिया
के पास जमा होकर उस सन्दूक को उठा कर मेरे पास ले आना । मैं कुटिया के द्वार और
खिड़किया वन्द करके उस शैतान से निपट लूंगा । ऐसा मुझे हुक्म मिला है । उस समय तुम
लोग कुटिया के बाहर चारो ओर ढोल बजाते और रात भर ऊंचे स्वर में कुछ प्रार्थना करते
रहना । शैतान मुझ से मार खाते हुए रोएगा , चिल्लाएगा और न मालूम किस - किस प्रकार
का शोर - शराबा मचाएगा । तुम उसकी ओर कान तक न देना । केवल उस मुरदार की आवाजों को
अपने ढोल - ढमाको की ध्वनि में लीन करते रहना । हां , याद रखो इस बात
का किसी के पास जिक्र तक न करना।
दूसरे दिन सायंकाल को फातिमा के अंधविश्वासी
पिता ने वैसा ही किया जैसा उसके गुरु ने कहा था । सन्दक के अन्दर रखी हुई अबोध
फातिमा नदी में बहने लगी।
परन्तु सचमुच ही फातिमा का भाग्य चमक रहा था ।
उस स्थल से , जहां पर उसे बहा दिया गया था , कुछ
ही दूरी पर पेड़ों की छाया में , एक शाहजादा अपने तम्बू के बाहर विश्राम
कर रहा था । वह दिन भर शिकार खेलते - खेलते थक गया था और उसने नदी के तट पर अपना
डेरा डाला था । ज्यों ही उसकी नजर बहते हुए इस सन्दुक पर पड़ी , त्यों
ही उसने अपने नौकरों को हुक्म दिया कि वह उसे उठाकर उसके तम्बू में ले आए।
शाहजादे के नौकरों ने वह सन्दूक तैरकर पकड़
लिया और अपने स्वामी के पास ले आए । उसका ताला तोड़ कर ढक्कन उठा लिया गया ।
परन्तु यह क्या ? उसमें से तो एक अभूतपूर्व सुन्दरी निकली ।
शाहजादा उसे देखते ही उस पर मोहित हो गया । उसने फातिमा से विवाह करने की
प्रतिज्ञा की तो उस गरीब बाला ने अपनी सारी कहानी कह सुनाई।
यह कहानी सुनते ही शाहजादे के मुख से यह शब्द
निकले - फकीर के वेश में शैतान ! दुष्ट !! उसे मैं इस ढोग का मजा चखा कर रहूंगा ।
कहते ही उसने अपने एक खूखार शिकारी कुत्ते को उस सन्दूक में बन्द करवा दिया और
सन्दूक को पुनः नदी में बहा दिया । फातिमा के लिए तो उस काले दिल वाले दरवेश का
कथन अक्षरशः सत्य हो गया।
इसके थोड़े समय बाद ही जब वह सन्दूक नदी में
बहता हुआ पुलिया के पास आया तो दरवेश के चेलों उसे पकड़ लिया । वह उसे उठाकर दरवेश
की कुटिया में ले आए । दरवेश ने दरवाजा जोर से बन्द किया तो उसके शिष्यों ने दरवेश
के आदेशानुसार बाहर शोर - शराबा मचाना शुरू किया।
जरा सोचो तो कि जब दरवेश ने सन्दूक का ढक्कन
खोला तो क्या हुआ ? वह खूखार शिकारी कुत्ता उस पर बिजली की तेजी से
झपटा और दरवेश को नीचे जमीन पर गिरा कर पैने दांतों से उसे काटने लगा धूर्त दरवेश
ने कुछ समय तक चिल्ला - चिल्ला कर आसमान सिर पर उठाया , परन्तु बाहर के
शोर - शराबे में उसकी पुकार कौन सुन पाता । वह जितना अधिक ऊंचा चिल्लाता गया उतना
अधिक बाहर भी शोर बढ़ता गया। यही तो उसकी आज्ञा थी।
धूर्त दरवेश को पाप का फल भोगना पड़ा और उस कुत्ते ने उसके शरीर के चिथड़े - चिथड़े कर डाले

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