हीमाल नागराय (यह लोककथा सम्भवतः कश्मीर की एक प्राचीनतम लोककथा है , जो आज भी चाव में सुनी जाती है । यह उस युग की द्योतक है जब कश्मीर देश जल...
हीमाल नागराय
(यह लोककथा सम्भवतः कश्मीर की एक प्राचीनतम लोककथा है, जो आज भी चाव में सुनी जाती है । यह उस युग की
द्योतक है जब कश्मीर देश जल - मुक्त हो चुका था।)
बहुत दिन हुए, न मालूम कितने हजार वर्ष, जब कश्मीर पर बलवीर नाम का राजा राज करता था। उन
दिनों कश्मीर के एक गांव में, जिसका नाम बलपुर था, एक गरीब ब्राह्मण रहता था। उसका नाम सिद्धराम था। उसकी बीबी बहुत बदमिजाज थी। वह लगभग हर रोज पति से झगड़ा करती और उसे खोटी -
खरी सुनाती। सिद्धराम हर रोज की इस तू - तू मैं - मैं से तंग आ गया था । बहुत
दिनों तक सहन करते - करते मानसिक अशान्ति से वह थक सा गया । फिर एक दिन पंडितानी
जी ने, न मालूम कौन सा बहाना बना कर, उसे बहुत बुरा भला कहा। अब वह अधिक सह न सका।
उसने रात को भोजन भी न किया और सारी रात चिन्ता और भविष्य की योजना बनाने में
गुजार दी। दूसरे दिन प्रातःकाल ही वह घर से बिना कुछ कहे सुने चल दिया।
चश्मे को कश्मीरी भाषा में ' नाग ' कहते हैं
चलते चलते वह दोपहर को एक जंगल में पहुंचा, तो थक कर चूर हो गया था। वह एक स्थान पर पहुंचा जहां एक चश्मा था । चश्मे को कश्मीरी भाषा में ' नाग ' कहते हैं । उसने भूख मिटाने के लिए कुछ जंगली फल खाए और भर पेट पानी पिया । वह रात भर जागता रहा था इसलिए वह वहीं पर पांव पसार कर सो गया । कुछ देर सोने के पश्चात बह जागा और आगे बढ़ा । वह अभी कुछ दूर ही गया था कि उसकी नजर एक जहरीले सांप पर पड़ी , जो पगडंडी के बीच में पड़ा था । वह भय से ठिठक गया और सांप की ओर गौर से देखने लगा । जब कुछ देर एकटक देखने पर भी उसे यो लगा कि सांप हिलता ही नही तो वह यह समझ कर आगे चला कि शायद यह सांप मर गया है । जब वह उसके निकट पहुंचा तो क्या देखा कि सांप जख्मी होकर पड़ा हुआ है। उसके शरीर पर किसी पक्षी द्वारा काटे जाने के ताजा जख्म दीखते थे जिनमें से खून बह रहा था । सिद्धराम के दिमाग में एक ख्याल आया और उसने सर्प को लकड़ी से उठा कर अपने थैले में बन्द कर दिया । वह अब इस थैले को लेकर बड़ी तेजी से वापस घर लौट आया। वह अभी घर के आंगन में ही था कि उसकी बीबी ने उसे देखा और शेरनी की तरह कड़क कर पूछा - मूर्ख आलस्यराज , इतना समय व्यर्थ कहां बिता के आए हो ? भूख ने सताया होगा तो घर याद आया । सिद्धराम ने हंसते हुए उत्तर दिया - हर बार यो जली कटी सुनाना कहां का न्याय है। यह देखो मैं तुम्हारे लिए कितनी सुन्दर चीज लाया हूँ । -अच्छा , तो जरा देखू क्या ले आए तुम । कह कर उसने उस से थैला ले लिया और कमर में घुस गई । उसने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। सिद्धराम बाहर ही खडा उस धूर्त फूहड़ बीबी के रोने - धोने की आवाज सुनने की प्रतीक्षा करता रहा क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि साप उसे इस लेगा और उसे भी कर्कशा पत्नी से छुटकारा मिलेगा । इसके विपरीत अंदर से बीबी की हर्ष भरी पुकार सुन कर वह आश्चर्यचकित हो उठा । वह हंसती और खुशी से फूली न समाती हुई यो आवाज दे रही थी - अजी , द्वार खोलिए और अंदर आ कर देखिए कि कितना सुन्दर बालक है यह। सिद्धराम जब द्वार खोल कर अन्दर गया तो क्या देखा कि वहां सांप का नामो - निशान भी नहीं है । उसके बदले वहां एक सुन्दर राजकुमार खड़ा है , जो उसकी बीबी के गले में मोतियों की एक के बाद एक माला पहना रहा है और उसके गुणगान कर रहा है।
कश्मीर के चश्मों का राजा
असल में वह सर्प नागराय ( कश्मीर के चश्मों का राजा ) था । बात यह थी
कि नागराय वहां जंगल में धूप का आनन्द लेने आया था । इसी बीच एक राक्षस उधर से
उकाब का रूप धारण किए हुए उड़ रहा था । उसने नागराय को सर्प के रूप में पहचाना तो
उस पर झपटा और उसे जख्मी कर डाला । बस उसी समय सिद्धराम ने उसे उठाया था । खैर अब
नागराय सिद्धराम के घर में ही रहने लगा । वह दिन भर भ्रमण करता और फिर सायंकाल
राजा बलवीर के उद्यान में घुस कर फुलबाड़ी का आनन्द लेता । एक दिन वह इसी शाही
उद्यान के अन्दर एक तख्त पर लेटा और सो गया । अभी उसकी आंख लगी ही थी कि उसके
कानों में बालिकाओं के हंसने की आवाजे पड़ी और वह उठ कर बैठ गया । इतने में राजा
बलवीर की राजकुमारी जिसका नाम हीमाल ' था , अपनी सखियों के संग वहां पहुंची । दोनों की नजरें
चार हुई और वे एक दूसरे से प्रेम करने लगे । कुछ क्षण वहां खड़ी रहने के बाद हीमाल
सहेलियों के संग वहां से चली गई । परन्तु महल में उसे चैन पड़ा । जब राजकुमारी
हीमाल का दिल नागराय के लिए यों तड़पने लगा , तो उसने
सहेलियों को उसे ढूंढने के लिए बाग में भेजा । पर इस बीच नागराय भी वहां से चल
दिया था । इसके बाद हीमाल दिनों दिन क्षीणकाय होती गई । उसे हंसी - ठिठोली , खेल - कूद यहां तक कि सैर - सपाटे और खाने - पीने
में भी मजा न आता था। वह बहुत अधिक दुर्बल हो गई। उसकी सहेलियों ने उसके चितचोर की
हजार तलाश की पर वह कहीं न मिला । उधर नागराय भी हीमाल की एक झलक देखने को तरसता
रहा । राजा अपनी पुत्री की हालत देखकर दुखी हुआ। उसने अपने एक विश्वासपात्र नौकर
के जरिये हीमाल की इस दशा का कारण मालूम किया । जब उसे इस बात का पता चला तो उसने
भी नागराय को ढूढ़ने का यत्न किया , लेकिन
वह सफल न हुआ।
राजकुमारी का स्वयंवर
तब उसने सोचा कि राजकुमारी का स्वयंवर रचाऊं । यह खबर सुन कर उसका प्रेमी
जरूर आएगा । यह सोचकर उसने दूर - दूर तक के रजवाड़ों में अपने नौकर भेजकर स्वयंवर
की खबर भेजी । स्वयंवर के दिन दूर - दूर से राजकुमार आए , पर हीमाल का मनमोहन , ' नागराय ' नहीं
आया । राजा बलवीर ने आगंतुक राजपुत्रों को सम्मान से वापस रवाना किया । उसका दिल
बहुत ही दुखी रहा । वह यह सोचने लगा कि उसकी बेटी हीमाल पागल हो गई है और उसका
परिणाम यही है कि वह उम्र भर अविवाहिता ही रहेगी । हर एक रात के बाद सुबह जरूर
होती है । इसी प्रकार हीमाल का भी भाग्य चमका । वह एक दिन पालकी में नगर भ्रमण को
निकली थी कि उसने दर्शकों भीड़ में अपने नागराय को दूर से देखा । वह झट से पालकी
में से कूदी और दौड़ कर अपनी मोतियों की माला उसके गले में पहना दी । उसे अपने .
पिता के पास ले गई और बोली - पिताजी यह हैं मेरे चितचोर , मेरे पति । नागराय ने जब अपना पूरा परिचय दिया तो
राजा बलबीर बहुत खुश हुआ और उसने विधिपूर्वक उन दोनों का विवाह कराया । बहुत दिनों
तक राज्य भर में खुशियां मनाई गईं । समय बीतने पर वह दिन आ पहुंचा जब नागराय ने
फिर अपने निवास पाताल में जाना था । हीमाल और नागराय राजा बलबीर के महल से जब चले , तो उसके पिता की आंखों से प्रेमाश्रुओं की धारा
बह चली । नागराय हीमाल को उसी चश्मे के पास ले गया जहां सिद्धराम ने उसे पाया था ।
वहां पर वह उसमें कूद कर हीमाल सहित पाताल लोक में उतरे।
नागराय की एक रानी
नागराय की अपनी जाति की एक रानी वहां पर मौजूद थी । वह अपनी सौत को देख मन ही मन जलने लगी । पटरानी होने के कारण वहां उसी की चलती थी । उस नागिन ने उसके साथ बुरा व्यवहार करने में कोई कसर उठा न रखी । उसने उसे अपने बच्चों नागपुत्रों को दूध पिलाने का काम सौंप दिया और बोली - ओ भूलोक की नारी ! देखो , जब दूध उबल कर ठंडा हो जाया करे तो यह घण्टी बजा बजा कर मेरे पुत्रों को बुलाया करना । वे आ कर दूध पिया करेंगे । दुर्भाग्यवश दिन , जब अभी दूध उबल ही रहा था , न मालूम क्योंकर वह घण्टी बज उठी । वे नागपुत्र दौड़ दौड़ कर आए और गरम दूध पीने लगे । इस से उनके मुंह जल उठे और वे रोने लगे । नागरानी ने उनकी यह हालत देखी तो क्रोध में आकर हीमाल को जहां तहां डसा , जिससे वह बेहोश होकर फर्श पर गिर गई । नागराय को इस बात का पता चला तो वह भी दौड़ा हुआ अपनी प्रिया हीगाल के पास आया । उसने उसे अपनी भुजाओं में उठाया और उसे भू - लोक पर ले आया । उसने उसे स्वस्थ किया । उसके बाद उसने एक बड़े से पेड़ पर उसके लिए एक महल बनवाया और वहीं पर है रखा । जब वह पूरे तौर से ठीक हो गई तो नागराय यह कह कर विदा हुआ – प्रिये ! यहां तुम्हें हर तरह का सुख मुहैया होगा , लेकिन तुम्हें मेरे पास फिर पाताल लोक में रहने की इच्छा का पूर्ण से त्याग करना होगा । मैं तुम्हारे पास अक्सर आता ही रहूंगा।
नागराय के साथ पाताल लोक
हीमाल इस तरह के जीवन से जल्दी ही ऊब गई , और वह नागराय के साथ फिर से पाताल लोक में जाने के लिए आग्रह करने लगी । वह उसे जान - बूझ कर मौत के मुंह में नहीं ले जाना चाहता था और हर बार मना करता रहा । उसे उसे यह भय दिखाकर कि अगर वह इस बात पर हठ करेगी तो वह उसे त्याग ही देगा , वह कुछ समय तक चुप रखने में सफल हो गया । परन्तु एक बार वह अपनी बात पर अड़ी रही और उसके पीछे - पीछे भागी । नागराय जब पाताल लोक में जाने के लिए उस चश्मे में कूदा तो हीमाल भी उसी के पीछे कूदी । उसने उसे पकड़ने की कोशिश की , पर वह उसके सिर के कुछ बाल ही पकड़ पाई और वे ही उसके हाथ में रहे । नागराय यह जा वह जा अपने महल में पहुंच गया । उसके बाद प्रेम दीवानी हीमाल पागल सी सारे कश्मीर में भ्रमण करती रही और हर एक से यही पूछती रही - आपने मेरे नागराय को तो नहीं देखा ? और इसी वियोग में वह एक दिन परलोक सिधार गई ।

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