शाहजादा शबरंग बहुत दिन हुए कश्मीर का बादशाह शिकार खेलने के लिए जंगल में गया । वह एक हिरण का पीछा करते हुए , जंगल में बढ़ता चला गया । सायंक...
शाहजादा शबरंग
बहुत दिन हुए कश्मीर का बादशाह शिकार
खेलने के लिए जंगल में गया । वह एक हिरण का पीछा करते हुए , जंगल में बढ़ता
चला गया । सायंकाल को वह अपनी राजधानी से बहुत दूर एक बाग में निकल गया । उस बाग
के अन्दर उसे एक लताकुंज में एक शाहजादी दिखाई दी । उसे देखते ही बादशाह ने सोचा
है तो यह एक शाहजादी पर यह लगती बड़ी घमंडी है।
उसका कहना सच ही था क्योंकि उस शाहजादी
ने उसकी ओर नजर तक न उठाई । इस पर वह बादशाह धीमी आवाज में बोला - ईश्वर करे कि
तुम से कोई शाहजादा विवाह करे , और उसके बाद तुम्हें इसी बाग में त्याग
दे।
शाहजादी ने यह शब्द सुने तो बोली -
क्या ही अच्छा हो कि तुम से कोई विवाह करके ऐसे पुत्र को जन्म दे , जो
तुम्हारी ही पुत्री से विवाह करे । कह कर वह घमण्ड से सिर झटक कर वहा से चली गई।
ये शब्द बादशाह के लिए असहनीय थे । पर
इस युवती के रूप - लावण्य ने उसे मोहित किया था । वह महल में लौटने के लिए घोड़े
पर चढ़ते हुए बोला - कुछ भी हो , मैं इसे अपनी बीवी बना कर ही रहूंगा।
महल में पहुंच कर उसने दूसरे ही दिन
सुबह अपने वजीर और मंजिमयोर को बुलाया । उसने उन्हें आज्ञा दी - अभी जाकर उस
शाहजादी के पिता से मिलो और मेरा विवाह तय कर लो।
शाहजादी का पिता एक छोटे से पड़ोसी
मुल्क का राजा था । जब उसे यह पता चला कि स्वयं कश्मीर का बादशाह उसकी पुत्री से
विवाह करने का इच्छुक है तो वह बड़ा खुश हुआ । उसने हा भरी और विवाह का दिन भी तय
कर दिया । कुछ ही दिनों के बाद शाहजादी का विवाह कश्मीर के बादशाह के साथ बडी शान
से रचा गया और वह घमंडी राजकुमारी कश्मीर की रानी बन गई।
सारे देश में खुशियां मनाई गई । जहां
देखो वहां राग - रंग की महफिलें हो रही थी । सभी खुश थे पर दुल्हन खुश न थी ।
बादशाह उसे ब्याह कर लाया तो जरूर लेकिन उसने उसकी ओर आंख उठा कर भी न देखा । वह
महल के हरम में अकेली पड़ी रही । बादशाह उसके कमरे में जाने का नाम भी न लेता ।
शाहजादी ने कुछ दिन रो धो कर काटे । फिर उसे एकदम से बादशाह के साथ बाग में हुई
पहली मुलाकात की कटु बातें याद आ गईं और वह अपने भविष्य पर सोचने लगी । उसने मन ही
मन एक तदबीर सोची और उस पर अमल करने का प्रण किया।
कुछ मास बीतने के बाद उसने बादशाह से
मायके जाने की आज्ञा मांगी । उसने भी सहर्ष उसकी यह बात मान ली । वह खुश होकर बोला
- अब तुम्हारा गर्व टूट जाएगा । अब तुम किसी पर नाक भौं न चढ़ाया करोगी।
अब वह शाहजादी अपने माता - पिता के
यहां जाकर रहने लगी । फिर कुछ समय के बाद वह यात्रा करने निकली । यात्रा पर जाने
की बात बिल्कुल गुप्त रखी गई।
इस बीच कश्मीर का बादशाह , उसका
पति , भी राजधानी से अपने देश के एक भाग के दौरे पर निकला । उसने एक नदी के
तट पर एक सुहावने जंगल के निकट अपना डेरा डाला । सायंकाल को उसके नौकरों ने उन्हें
यह सूचना दी कि एक बुर्कापोश महिला आप से मुलाकात करने की इच्छुक है । साथ ही
नौकरों ने उनसे यह भी कहा कि वह युवती धनी तथा सुशील लगती है । उसने भी यहीं निकट
ही अपना डेरा डाला
हुआ है । बादशाह ने उसकी प्रशसा के शब्द सुने तो वह स्वयं उसके पास चला गया । न
मालूम इस नारी ने उस पर क्या जादू चलाया कि वह एकदम उसका बेदाम का गुलाम हो गया।
बादशाह और वह महिला एक मास तक साथ रहे
। यह महिला उमकी परित्यक्ता रानी के सिवा और कोई न थी । जब एक मास के बाद उस औरत
ने अपने देश लौट जाने का आग्रह किया तो बादशाह ने बहुत दुखी होकर उसे जाने दिया ।
जाते समय उन्होंने प्रेम की निशानी के रूप में अपनी अगूठियां बदल ली।
शाहजादी अपने पिता के घर चली गई तो समय
पर उसके एक पुत्र जन्मा । उसके माता - पिता को सब कहानी थी । वह जानते थे कि
पुत्री ने पति को फिर से पाने के लिए यह स्वांग रचा है । उन्होंने उसके पुत्र का
नाम शबरंग रखा।
मालूम शबरंग ननिहाल में पलता रहा । कुछ
बरसों बाद वह होनहार जवान दिखने लगा। वह अपने सहपाठियों को हर क्षेत्र में मात
देता। पर उसकी माता एक अलग योजना बना चुकी थी । वह उसे चोरी करने के फन में चतुर
बनाना चाहती थी । अतः उसने जहां तहां से माहिर चोरों को बुलवा कर , शबरंग को उनके द्वारा शिक्षा दिलवाई ।
अबोध बालक शबरंग को यह सब चोरी के हथकडे खिलवाड़ लगते थे । वह कुछ ही समय में ऐसा
चोर बन गया कि शैतान के भी कान कतरने लगा।
अपने पुत्र की चोरी में निपुणता की परख
करने के लिए वह उसे एक दिन एक पहाड़ी पर ले गई । वहां उसे एक ऊंची चट्टान पर बने
उकाब के घोंसले को दिखाते हुए यह आज्ञा दी - पुत्र शबरंग ! उधर देखो उकाब अपने
अण्डों पर बैठी है । उसका एक अण्डा चुरा कर ले आओ।
माता की आज्ञा पाते ही शबरंग ने कपड़े
उतारे और केवल एक लंगोट बांध कर उस चट्टान पर चढ़ने लया । वह बिना आहट किए उस
घोसले तक पहुंचा और उसके नीचे से एक अण्डा निकाल लाया । उकाब को पता तक न लगा । वह
अण्डा लेकर माता के पास पहुंचा तो उसने बड़े प्यार से उसे गले लगाया और हजार बार
चूमा । उसके नेत्रों से प्रेम - अश्रु बहे और बोली - बेटे , तुम कश्मीर के
तख्त के वारिस हो । जाओ और अपने पिता के पास नौकरी की तलाश करके , नौकर
होकर अपने पिता का मन हर लेने का पूरा यत्न करो । हां याद रखो , उसे
यह पता न होने दो कि तुम उसके ही पुत्र हो । जब वह तुम्हे अपनी पुत्री से विवाह
करने को कहे , तो यह कह देना कि मैं अपनी माता की आज्ञा के
बिना कोई काम नहीं करता । तब फिर मुझे बुला लेना ।
शाहजादाशबरंग अपने पिता के दरबार में
पहुंचा । वह वहां नौकर हो गया । वह सुन्दर तो था ही और साथ में चतुर और बुद्धिमान
भी । अतः वह बादशाह की नजरों पर चढ़ गया । वह बादशाह का निजी सेवक नियुक्त हुआ और
हर समय उसकी नजरों के सामने ही रहने लगा।
लेकिन शबरंग दोहरा जीवन व्यतीत करता
रहा । दिन भर वह बादशाह की सेवा में रहता और रात भर अमीरों की धन दौलत पर हाथ साफ
करता रहता । हजार यत्न करने पर भी पुलिस अधिकारी चोरी का पता न लगा पाते थे । एक
दिन नगर के लोग बादशाह के दरबार में दुहाई देते हुए पहुंचे और बोले - बादशाह सलामत
, अगर पुलिस इस चोर को पकड़ने में असमर्थ रहेगी तो हमारा सत्यानाश हो
जाएगा।
बादशाह को क्रोध आया और उसने पुलिस के
मुख्य अधिकारी को आज्ञा दी कि आज ही रात चोर को स्वयं पकड़ने जाओ और उसे मेरे
सामने उपस्थित करो।
आधी रात का समय था । पुलिस का मुख्य अधिकारी स्वयं पहरा देते - देते गली - कूचों में घूमता फिरता एक स्थान पर पहुंचा । वहां उसे अंधेरे में किसी आदमी की छाया दिखाई दी । उसने रीब से डांट कर पूछा रुको ! कौन हो तुम ? कहने के साथ ही वह उस जगह पहुंचा और उसका हाथ पकड़ लिया । जब वह उसका हाथ पकड़ कर उसे रोशनी में ले आया तो वह यह देखकर कि वह मर्द नहीं एक औरत है हैरान हो गया । उसने उससे डपट कर पूछा - तुम इस समय वहां क्या कर रही थीं ?
उस औरत ने थर - थर कांपते हुए उत्तर
दिया - आप जिस चोर की तलाश कर रहे हैं , वह अभी - अभी यहीं से गुजरा है । वह
क्षण भर में शायद इसी रास्ते से लौट आएगा ... ओह , मुझे कितना भय
लग रहा है।
चुप रहो मूर्ख , मुझे कुछ सोचने
दो - उस अधिकारी ने कहा - मैं उसे पकड़ने की चाल सोच रहा हूँ।
औरत ने धीने से स्वर में बात काट कर
कहा - जनाब , मैं भी कुछ मशविरा दू आप अपना भेस बदल कर उसकी
प्रतीक्षा कीजिए ... ठीक समझें तो आप मेरे साथ पोशाक बदल लें । और उस कुएं पर से
पानी खीचने का स्वांग रचे मेरे दिमाग में यही बात आई है सरकार !
पुलिस अधिकारी उसकी यह सलाह मान बैठा ।
उन्होंने कपड़े बदले और वह पुलिस अधिकारी कुएं से पानी खींचने लगा । पानी कैसे
खींचा जाता है , यह न जानने के कारण डोल उसे खींचने लगा और वह
डोल के साथ अन्दर को लटक गया और सहायता के लिए चिल्लाने लगा । उस नकली औरत ने
ठहाका मार कर हंसते हुए उस से कहा - सरकार , अब सुबह तक ऐसे
ही लटकिए । मैं अब जा रहा हूं।
वह औरत तो स्वयं छद्मवेशधारी शबरंग था
दूसरे दिन सुबह लोगों ने मुख्य पुलिस
अधिकारी को इसी हालत में कुएं में लटकते हुए पाया तो नगर भर में परेशानी फैल गई ।
बादशाह को बड़ा क्रोध आया । वह भी कुछ न सोच पाया । उसने वजीर को आज्ञा दी कि वह
आज ही रात स्वयं जाकर चोर को पकड़ कर ले आए , नहीं तो उसकी
खैर नहीं । वजीर को इस प्रकार रात भर चौकीदारी करना पसन्द तो न आया पर लाचार था ।
वह रात के समय घोड़े पर सवार होकर नगर की पहरेदारी करने लगा । वह एक जगह पहुंचा तो
देखा कि सड़क पर एक जगह एक बुढ़िया बैठी चक्की में गेहूं पीस रही है । वजीर ने
निकट पहुंचकर बड़े रीब से पूछा - दादी मां रात में यहां क्या कर रही है । हां ,
कहीं
तूने उस चोर को तो नहीं देखा जिसने नगर में उपद्रव मचा रखा है।
उस बुढिया ने उत्तर दिया - मैं न तो
हां कह सकती हूं न ना । क्योंकि मैंने अभी - अभी आस - पास ही कुछ अजीब - सी आवाजें
सुनी है । हो सकता है कि वह यहीं कहीं नजदीक ही हो।
यह बुढ़िया शबरंग ही था । उसने बजीर को
भी झांसा दिया । उसे बुड़िया के कपड़े पहनवा कर वहां चक्की पर बिठाकर , स्वयं
उसके कपड़े पहन कर वह उसी के घोड़े पर चढ़कर वहां से चल दिया । सुबह वजीर को
बुढ़िया के फटे कपड़े पहने हुए देखकर नगर में खूब मखौल भी उड़ा और चोर की चतुराई
पर हाहाकार भी।
बादशाह यह खबर पाकर आग बबूला हो उठा और
अमीस्वजीरों को डांट सुनाते हुए बोला - एक अजीब हैरानी है । आप सभी लोग सचमुच ही
नालायक हो जो एक चोर को पकड़ना तो क्या , उसके झांसे में आकर अपना भी मखौल
उडवाते हो और सरकार का भी । मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि वह चोर तुम सबसे अधिक
बुद्धिमान और चतुर है । यदि वह अपने आपको प्रकट करे तो मैं उसका विवाह अपनी
राजकुमारी से करूंगा । यह मैंने निश्चय किया है।
यह सुन सारे दरबार में कुछ समय तक सन्नाटा छा गया । किसी को कुछ कहने की हिम्मत न हुई । अंत में शबरंग एक कदम आगे बढ़कर बोला - बादशाह सलामत ! क्या आप इस प्रण को निभाएंगे ?
यह सुन बादशाह कुछ क्षण तक उस युवक को
सिर से पांव तक देखता रहा । फिर उस पर एक तीव नजर डालते हुए बोला - हां , यही
मेरा प्रण है । मैं इसे जरूर पूरा करना ।
तो सुनिए सरकार मैं ही वह चोर हूं ।
अगर आपको इसका सबूत चाहिए तो मैं हर एक व्यक्ति का माल आज ही लौटा दूंगा । आप केवल
समय नियत कीजिए - शबरंग ने उत्तर दिया।
सारे दरबारी मूर्तिवत वहां उसकी और
ताकते ही रह गए । वे कुछ भी न कह पाए।
बादशाह की तीव्र नजरें एकदम से नर्म हो
गई क्योंकि पहले से ही यह युवक उसकी नजरों पर चढ़ा हुआ था । अब उसकी इस चतुराई को
देखकर वह और भी मुग्ध हो गया । शबरंग बोला - परन्तु बादशाह सलामत , मैं
माता की आज्ञा के बिना कुछ भी नहीं करता । मैं तब तक आपकी पुत्री से विवाह नहीं कर
सकता जब तक वह न माने ।
शबरंग अपनी माता को दरबार में ले आया । उसने बादशाह को वह अंगूठी हाथ में दी जो उसने विदा होते समय उसे दी थी । वह बोली - सरकार , यह युवक जिसका नाम शबरंग है आपका ही पुत्र है । मैं भी आपकी ब्याहता बीवी हूं । भला वह अपनी बहन से क्योंकर विवाह कर सकेगा ?
उसने अपनी सारी कहानी शुरू से लेकर अंत तक बादशाह को सुना दी । बादशाह और वह एक दूसरे से मिलकर हर्षित हुए । बादशाह ने अपनी बीवी और पुत्र शबरंग को गले लगाया । महल में राग - रंग की महफिलें शुरू हुई और शबरंग को तख्त पर बिठाया गया । सारे मुल्क में खूब जश्न मनाए गए।

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