कथा तन्त्र मन्त्र की बहुत पुरानी बात है । एक बार एक शिकारी प्राखेट के लिए जाते हुए ऐसे देश में जा पहुंचा , जिस देश की स्त्रियां तो स्त्रिय...
कथा तन्त्र मन्त्र की
बहुत पुरानी बात है । एक बार एक शिकारी
प्राखेट के लिए जाते हुए ऐसे देश में जा पहुंचा , जिस देश की
स्त्रियां तो स्त्रियां थीं और उनके पुरुष कुत्ते । जो भी आदमी उनके देश में
पहुंचता , उन्हें कुत्ते मार कर खा जाते थे । कुत्तों से कोई बच न पाता था ।
छुपने पर भी वह उन्हें ' मान् चाङ गमा ' ( मन्त्र
- गणना ) कर ढूंढ निकालते थे । इस ' मान् चाङ गमा ' का प्रयोग करने
पर गुप्त से गुप्त स्थान का भी पता लगाया जा सकता है।
कुत्ते उस समय गांव में नहीं थे ,
तभी
वह शिकारी उस विचित्र देश में जा पहुंचा । स्त्रियां उस मनुष्य को देखकर अति
प्रसन्न हुई । स्त्रियों को उस पर दया आई । उन सबने कहा- " हे पुरुष ,
हम
पुरुष ( आदमी ) को तो चाहती हैं , किन्तु हमारे पति ( कुत्ते ) आ जाएंगे
तो तुम्हें मार डालेंगे । अतः तुम जल्दी यहां से चले जानो अन्यथा तुम्हारे प्राण
चले जाएंगे । अगर कुत्तों ने तुम्हें देख लिया तो तुम अपने सिर पर मिट्टी का एक
ढेला रख लेना जिससे उनकी अमोघ मन्त्र गणना ( मान् चाङ गमा ) असफल हो जाएगी । इस
प्रकार तुम बच सकते हो , अन्यथा तुम जैसे असंख्य मनुष्यों की
जानें इन कुत्तों के कारण चली गई हैं।"
शिकारी को स्त्रियों ने भोजन दिया और
मनुष्य देश का समाचार जाना । शिकारी कुछ देर विश्राम कर चला गया । संध्या समय
कुत्ते लौटे तो उन्हें गन्ध से पता चला कि कोई मनुष्य उनके देश में आया है । सभी
कुत्ते , मनुष्य ( शिकारी ) की खोज में निकल पड़े । शिकारी अभी कुत्तों के देश
की सीमा पार नहीं कर पाया था । रात हो गई थी । अतः शिकारी स्त्रियों के कहे अनुसार
एक मिट्टी का ढेला अपने सिर पर रखकर ऊंचे पेड़ की एक डाली पर रात बिताने के लिए
बैठ गया।
कुछ देर बाद बड़े - बड़े कुत्ते उस
पेड़ के नीचे आ पहुंचे और अपनी मन्त्र - गणना ' मान् चाङ गमा का
प्रयोग करने लगे । मंत्र - गणना का उत्तर अजीब - सा निकला : “ काते
फा काने निन , काने निन काते फा " यानी बादल के नीचे
मिट्टी के नीचे , मिट्टी के नीचे वादल के नीचे । कुत्तों ने कई
बार मंत्र - गणना का प्रयोग किया , किन्तु एक ही उत्तर बार - बार निकला कि
आवमी ने अपने सिर पर मिट्टी का ढेला रखा है । कुत्तों की मन्त्र - गणना असफल हो गई
। यह प्रयोग असफल जान कर कुत्तों ने उन मन्त्र - गणना के औजारों को वहीं पेड़ के
नीचे थूक कर फेंक दिया और सभी अपने घर चल आए।
शिकारी पेड़ पर से कुत्तों की मन्त्र -
गणना देख रहा था । बात सही निकल रही थी , किन्तु कुत्तों की समझ में न आया ।
सुबह होने पर शिकारी पेड़ से नीचे उतर आया । उसने कुत्तों द्वारा प्रयोग किए हुए मन्त्र
- गणना के औजारों को समेट कर झोली में डाल लिया और अपने देश की ओर चल दिया । वह
कुत्तों के देश से बचकर आया और अमोघ मन्त्र - गणना ' मान् चाङ गमा के औजार भी साथ लाया । उसने अपने देश में उनका प्रयोग
किया तो हर - उत्तर बहुत ही सत्य प्रमाणित सिद्ध हुआ । शिकारी अपने आखेट के लिए भी
उसका प्रयोग करता था , उससे
उसे बहुत सफलता मिलती थी । देशवासियों के बीच भी इसका प्रचार एवं लोकप्रियता बढ़ती
गई । लोग शिकारी को गुरु मानकर उन मन्त्रों को सीखने लगे । अब लोग अपने आप भी वह
मन्त्र - पट्टियां बनाकर प्रयोग करने लगे।
मन्त्र - पट्टियां बांस से बनाई जाती
है । ये पट्टियां पाठ इंच लम्बी होती हैं । पट्टियों में मन्त्र लिखा रहता है ।
लोग आंख बंद करके उन मंत्र - पट्टियों में से एक पट्टी को खींच कर पढ़ते हैं । जो
उस पट्टी में लिखा रहता है , उसे ही सत्य माना जाता है।
इस प्रकार ' मान् चाङ्गमा
पट्टियों को बनाने के लिए केवल उसी अर्थी के बांस का प्रयोग किया जाता है जिस पर
मंगलवार या शनिवार के दिन किसी मरे हुए भावमी का शव ढोकर श्मशान लाया जाता है ।
यदि वह बांस ऐसी अर्थी का हो जिस पर किसी जवान मृतक को टोकर लाया गया होतो और भी
अच्छा समझा जाता है।
इस प्रकार की ' मान् चाङगमा ' मंत्र - गणना का प्रयोग बाम्ति समाज में आज भी है । बौद्ध धर्मावलम्बी होने पर भी खाम्ति लोग तन्त्र - मन्त्रों पर विश्वास करते हैं । गांवों में ' मान् चाङ्गमा मन्त्र - गणना की पट्टिया वयोवृद्ध लोग रखते हैं । लेकिन अब शिक्षा बढ़ने के साथ - साथ इसका प्रयोग कम होता जा रहा है।

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