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जिन को कुजिन टकरा बात

जिन को कुजिन टकरा बात बहुत पुरानी है , न मालूम कब की । कश्मीर के लोलब इलाके को एक गांव में , जहा के जंगलों में देवदार और चीड के पेड़ों की ...

जिन को कुजिन टकरा बात

बहुत पुरानी है , न मालूम कब की । कश्मीर के लोलब इलाके को एक गांव में , जहा के जंगलों में देवदार और चीड के पेड़ों की बहुतायत है , एक नौजवान रहता था । उसका नाम नबीरा था । नबीरा गांव के लोगों और खासकर अपने समवयस्कों में बहुत बुद्धिमान और चतुर समझा जाता था । लोगों में वह अपनी बुद्धिमानी के कारण ' नबीरा चालाक के नाम से प्रसिद्ध हो गया । वह हर समस्या का चाहे वह कितनी ही कठिन हो , ठीक - ठीक समाधान निकाल ही लेता था । इस कारण वह गांव के सभी लोगों की आंखों का तारा बन गया था।

उसके माता - पिता का देहान्त हो चुका था और उसका पालन - पोषण उसके चाचा - चाची ने किया था । उसके चाचा की इकलौती संतान थी एक लाडकी , जिसे उन्होंने रहमत नाम दिया था । रहमत भी बड़ी सुशील लड़की थी । उसके गुणों और स्वभाव की सराहना करते हुए गांव की बड़ी बूढ़िया थकती न थीं । वे अपनी बहू बेटियों को रहमत का अनुकरण करने को कहते हुए बोलती , " -कहां तुम और कहा वह गरीब घर की रहमत ? वह तो सचमुच ही खुदा की रहमत है । जिस घर में जाएगी उसका नाम रोशन करेगी।"

फिर एक दिन रहमत के पिता ने उसका विवाह नबीग से कर दिया और वे अब अपना अलग घर बसा कर रहने लगे । इस परिवार की अपनी कोई जमीन न थी और ये लोग जमीदारी के गोतों में मजदूरी करते थे । उन दिनों मजदूर को खेत में खून पसीना एक करने पर भी जमीदार लोग उपज की लगभग एक तिहाई फसल देते थे । शेष अनाज और घास स्वयं ले जाते थे । नबीरा भी इसी तरह मजदूरी करके दो समय की रोटी कठिनाई से जुटा पाता था । परन्तु रहमत चरखा कातने में माहिर थी । वह ऊन का बहुत महीन तार निकाल सकती थी । इसलिए जिस किसी जमीदार को अपनी लोई ( कम्बल ) तैयार करवाने के लिए ऊन कतबानी होती , वह रहमत को देता और उसे अपने इस हुनर के अच्छे दाम मिलते । अतः वे दोनो इस प्रकार कठिन श्रम से कुछ पैसा भी जोड़ने में सफल हो गए।

एक दिन सायंकाल रहमत गांव के पोखर पर पानी लाने को गई थी । जब उसने अपने दो घड़े भर कर , एक के ऊपर एक रखा , और दूसरी औरत से सहारा देकर सिर पर रखने की विनती की , तो उस औरत के दिमाग में न मालूम क्या ख्याल आया कि घडा उठवाने के बाद बोली - देखो आज तो मैने सहारा लगा दिया , पर खबरदार आगे कभी फिर न कहना।

सुन कर रहमत ने नम्रता से पूछा - क्यो बहन क्या बात है ? मुझसे कोई भूल हुई हो तो क्षमा करना ।

उसने नाक भौ चढ़ा कर उत्तर दिया - बड़ी आई , बहन कहने वाली । अरी , तू अपने को मेरी बहन समझने लगी ? एक मजदूर की बीबी , मुझ जमीदार की बेटी और बहू की बहन बनने योग्य है ? खबरदार यदि ये शब्द फिर कभी दोहराए । कहां तू और कहां मैं?

रहमत ने फिर भी मुस्करा कर जवाब दिया - अच्छा बेगम साहिबा , अब आगे कभी भी ऐसी भूल न करूगी । आज का गुनाह क्षमा करें।

कहने को तो उसने कह दिया पर घर लौटते हुए वह मन ही मन अपने भाग्य को कोसती रही । वह यह सोचने लगी - क्या खुदा की जमीन इन मगरमच्छों के लिए ही है । हमारे लिए नहीं । यदि होती तो यह औरत इस प्रकार मुझे क्यों कहती । हम कष्ट करें और यह लोग मौज उड़ाए । या खुदा यह कैसा न्याय !! इन्ही विचारों में मग्न वह मकान के सहन में आई , और भेड़ों को भूमो खिलाते हुए अपने पति नबीरा को भी न देखा।

वह अन्दर गई तो पीछे से वह भी दौड़ कर सहन में पहुंचा और उसके सिर पर से दोनो घड़े एक साथ उतार कर गडवंजी पर रखने के बाद बोला - बीवी ! क्या बात है ? क्या सोचते हुए घर में घुस गई ? इतना तक न किया कि रोज की तरह दिन भर का हालचाल ही पूछती ? सच कहो किस चिन्ता में हो तुम यो परेशान सी क्यों लग रही हो आज ? खैरियत तो है?

रहमत ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया - कुछ भी तो नहीं । पता नहीं आप क्या समझे । मैं न मालूम क्या सोच रही थी कि आपकी ओर ध्यान नहीं गया । आप थके हारे हैं . मैं रसोई में जाकर अभी चाय तैयार करती हूं । कह कर वह रसोई में जाकर समावार में कोयले डाल कर चाय बनाने लगी । परन्तु उसकी आखों में आंसू भरे थे।

यह देख उसके पति ने आग्रहपूर्वक फिर कारण पूछा तो उसने सारी बात कह सुनाई और बोली - अगर हम मजदूर न होते तो वह इस तरह मुझे कुत्ते की तरह क्यों दुतकारती । अच्छा कोई बात नहीं । अल्लाह की यही इच्छा है तो हम सिर झुकाते है।

यह सुन नबीरा उसे खुश करने को बोला - वाह री रहमत ! बस इतनी सी बात पर इतनी परेशानी । अच्छा तो मैं अभी यह प्रण करता हूं कि मैं भी शीघ्र ही अपनी जमीन का मालिक बन कर जमीदार बनूंगा।

रहमत ने सुना तो पूछा - अच्छा जी , यह तो बताइए कि वह जमीन खरीदने के लिए रकम कहां से लाओगे ? घर में तो कुल मिलाकर पांच रुपाए हैं , जो मुसीबत के लिए रखे हुए हैं।

अरी रहमत ' क्या तुम्हें मेरे भुजबल और फावड़े पर भरोसा नहीं ? मैं स्वयं खेत तैयार करूंगा । नबीरा ने उत्तर दिया।

यह सुन रहमत फिर बोली पर यह तो बताइए कि तम्हे यह मगरमच्छ , वह भूमि लेने भी देंगे ?

नबीरा ने हँस कर उत्तर दिया - भोली बीबी , नबीरा की बुद्धि पर विश्वास रखो । हा अपनी कमर भी खूब खा पीकर तगड़ी रखो , बंजर जमीन पर तू भी तो काम करेगी । बस छोड़ दे यह किस्सा और रोज की भाति आज भी हंस कर चाय पिला।

उस रात नवीरा को भी कल न पड़ी । वह सुबह उठा , मस्जिद में नमाज पढ़ कर आया और बीवी से यो कह कर कि ' अभी लौट कर आता हूं घर से चला गया । वह सीधा गांव के पटवार खाने पर गया । वहां पटवारी साहब को सलाम की और उसे अपने दिल की बात सुनाई । पटवारी , जिसे नबीरा कभी नाराज न करता था बोला - अरे नबीरा , मैं अपने आप भी तुझे कई दिनों से यही मशविरा देना चाहता था कि तू स्वय बंजर भूमि को तोड़ कर नवतोड़ जमीन का मालिक क्यों नही बनता ? खैर तू खुद ही आ गया । अच्छा तो मैं पड़ताल करके तुझे आज शाम को ही बता दूंगा कि तू किस बंजर को नवतोड़ बना ले । हां , शाम को खाना खाने के बाद आना , फुरसत से बात करेंगे।

पटवारी से सलाह लेकर नबीरा अपने घर आया । वहां बीबी ने चाय का प्याला पेश किया तो बोला पहले तू भी अपना प्याला ले आ , और समावार भी यही रख ले । साथ ही यह भी बता दे कि अगर तू अगले साल अपनी जमीन का अनाज खाएगी तो पीरे - दस्तगीर की चाय कितने आदमियों को पिलाएगी।

उसने उत्तर दिया - इस खुशी में सारे गांव को चाय पिलाऊगी । कह कर दोनों ने चाय पी और अपने अपने काम में जुट गए । रहमत चूल्हे , चौके और ऊन की कताई में और नबीरा खेत पर।

शाम हुई नबीरा ने खाना खाया और पटवारी से मिलने गया । वह अपने साथ उसका मुंह मीठा कराने के निमित्त श्वेत मधु का भरा एक प्याला भी ले गया । दुआ सलाम के बाद शहद की सौगात पटवारी जी को भेंट करने के बाद बैठा तो पटवारी जी बोले - नबीरा , मैने तुम्हारे लिए जमीन देखी है । मैंने तुम्हारे नाम उस बंजर को आबाद करने के कागज भी तैयार कर दिए हैं । आओ अभी उन पर अपना अंगूठा लगाओ । सरकार का नजराना कल ही पेश कर देना ताकि उसे मैं खजाने में जमा कर दूं । नजराना भी मैंने कुल तीन रुपए लगाए हैं । परन्तु नबीरा , जमीन झाड़ - झंखाड़ से पटी पड़ी है । बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी । कह कर उसने सरकारी कागज निकाले और उन पर नबीरा के अंगूठे लगवाए और बोला - बस अभी किसी से न कहियो।

फाल्गुन के मास में हिम के पिघलने के साथ ही मैं तुझे सब के सामने उस जमीन के टुकड़े का मालिक बना दूंगा । तब तक किसी को कानों - कान खबर न करना । खबरदार , बड़े जमीदारों को पता चला तो बुरा होगा।

यह बात कह कर उसने उसे विदा किया । नबीरा खुश होकर घर आया , बीवी को सब बात समझा दी और वे फाल्गुन मास की प्रतीक्षा करने लगे।

शिवरात्रि का पर्व था , हिम पिघल रही थी , मौसम जोत का आ गया था , पटवारी जी ने उस बंजर जमीन के टुकड़े पर गाव वालों को एकत्र किया और फिर सरकारी हुक्म सुनाते हुए नबीरा को उस पड़ती भूमि का मालिक घोषित कर दिया । दूसरे ही दिन नबीरा ने अपने मित्रों कबीर , रहीम , रहमान आदि को पड़ती जमीन को खेती योग्य बनाने में सहायता देने का निमंत्रण दिया । वह ही नहीं उसके सभी मित्र फावड़े आदि औजार लेकर उसकी सहायता को जुट आए और दो - चार दिनों में उसे साफ करके धरती को खेती के लिए तैयार कर दिया । कुछ दिनों के बाद नबीरा जब खेत पर काम करने के बाद सायकाल को घर लौटने लगा , तो एक अजीब घटना घटी । उसके सामने , अंधेरे में से , न मालूम कहां से एक मोटी - सी मुर्गी अनगिनत बच्चों को लिए हुए कुड - कुड़ करती हुई आई और उसका रास्ता रोक लिया । शाम हो गई थी उसने उसे हटाने के हजार यत्न किए पर बह न हटी । जिस ओर का रास्ता नबीरा लेता उसी ओर वह भी झट से पहुंच जाती । वह बड़ा परेशान हो गया कि करे तो क्या करे ? वह यही सोच रहा था कि क्या देखा कि सामने न कहीं मुगी है और न चूजे । उनके बदले उसका रास्ता रोके हुए भेड़ बकरियों का मिमियाता हुआ एक भारी संख्या का रेवड़ है । उसने दाएं - बाएं जहां भी जाना चाहा वहां वह रेवड़ आ मौजूद हो गया । न मालूम वह इस तरह ऊबड़ - खाबड़ भूमि में से गुजरता हुआ , काटेदार झाड़ियों से कपड़े फाड़ता हुआ किस ओर लगा , पर उसे रेवड़ ने न छोडा । इतनी देर में उसे दूर से कुछ बटोही हाथों में लशिवुडुर ( मशाल ) लिए हुए उधर की ओर आते दिखाई दिए । उस रोशनी को देखते ही न कहीं भेडे रहीं न कुछ । जब वह आदमी उसके पास पहुंच गए तो उसे पता चला कि वह घर के रास्ते से दूर जंगल की ओर भटक गया था । खुदा , खुदा करके वह घर पहुंचा और चैन की सांस ली । वह सोचता रहा कि जो कुछ मैने रास्ते में देखा वह क्या मामला था । हो न हो यह कोई जिन भूत की लीला थी।

दूसरे दिन वह फिर शाम को खेत पर से घर लौटने लगा तो क्या देखा कि उसके सामने एक भीमकाय काला भूत - सा आदमी उसका रास्ता रोक कर खड़ा हो गया , नबीरा ने झट से कमीज की जेब में से चाकू निकाला , उसे बिसमिल्लाह ' कह कर जमीन में गाड़ा और बैठ गया । ऐसा करने की देर थी कि वह भीमकाय व्यक्ति एक साधारण मनुष्य जितना हुआ और गुर्रा कर बोला , -ओमानुष जात | तेरे साथ चाकू न होता तो आज खत्म करता तुझे । जानते हो मैं कौन हूँ ? मैं इस जगह का मालिक जिन है । तुम्हारी यह हिम्मत कि तुम मेरी जमीन में फसल उगाओ।

नबीग हँसा , और मन में अपनी योजना बना कर नम्रता से बोला - माफ कीजिए जिन साहब , जमीन तो जोत कर फसल उगाने के लिए बनी है । पड़ी रहने के लिए नहीं । अगर मैं इसमें फसल उगाने लगा तो यह कौनसा गुनाह है?

--गुनाह तो कोई नहीं किया . पर यह बताओ आदम ' जमीन मेरी है । मुझ से हिस्सा बटाई तो मुकर्रर करते पहले

नवीरा ने बात बनते देख उत्तर दिया - मेरे आका , यह गुनाह माफ करो । मैं जन्म से ही काश्तकार रहा हूं । चलिए आप भी हँसी - खुशी मुझे इस भूमि का अपना कान्तकार बनाइए । मनुष्य की दासता के बाद आपका ही दाम बना रहूगा । आप ही प्रसन्न रहिए।

जिन मोटी बुद्धि के होते ही हैं । इस पर नबीरा ने उसकी जब यों खुशामद की तो वह खुश होकर बोला - चलो . जब तुम मेरे दास काश्तकार बनना चाहते हो तो मुझे भी खुशी ही है । हां , फसल की हिम्सा बटाई मुकर्रर करो अभी , इसी समय । मैं लेता तो दो तिहाई पर चलो तुम से आधी ही उपज लूगा।

नबीरा ने अपनी प्रखर बुद्धि का सहारा लेकर कहा - मालिक , चलो यही सही । आप यह तो बताइए कि आप फसल का कौन - सा आधा भाग लेंगे , ऊपर वाला या निचला ?

यह भी कुछ बात है । मैं ऊपर का भाग लूंगा , जिन ने उत्तर दिया।

तो मालिक यह मुझे भी मजूर है । अब मुझे घर जाने कि आज्ञा दीजिए , नबीरा ने कहा । -अच्छा तो जाओ . कह कर वह जिन गायब हो गया और वह घर लौटा । पर उसने बीवी से यह बात कुछ भी न कही . क्योकि औरतो का दिल कमजोर होता है।

भूमि को ठीक - ठाक करके इस बार नबीरा ने उसमे शलगम और मूली बोई । उसकी ठीक तरह से नलाई आदि की , पानी दिया , और समय पर इसमें हरे - हरे पत्तों की एक मखमली चादर सी बिछ गई । नबीरा मन ही मन खुश था । एक दिन सायकाल को फिर वह जिन मनष्य रूप में आ खडा होकर बोला - अरे ओ काश्तकार , फसल तो तैयार है । इसे कब काटेगा ?

नबीरा ने उत्तर दिया - मालिक , कल सुबह काटूंगा । हां , यह तो बताइए कि आप अपना भाग लेने के लिए किस समय आएंगे ?

तुम मेरा भाग यहीं पर ढेर करके रखी । मैं स्वय बाजार ले जाऊगा , कह कर जिन गायब हो गया।

नबीरा ने मूली - शलगमों का अपना भाग अलग किया और पत्तों का अम्बार एक किनारे लगाया।

दूसरे दिन वह अपनी फसल लेकर बाजार पहुंचा और जिन भी पत्तों का बोझा लेकर मनुष्य रूप में उसी स्थान पर बैठा । नबीरा का माल जल्दी ही बिक गया और वह रकम लेकर घर लौटा । पर जिन के पत्तों को ओर देखकर लोग केवल हंसते हुए चले गए पर मोल लेना किसी ने पसन्द न किया । जिन अपना माल न बिकते देख जल भुन गया और उसे वहीं पास के नाले में फेक कर लौट आया।

दूसरी बार जब नबीरा फिर से खेत में हल जोतने को आया , तो जिन साहब भी फिर आ धमके और बोले - ओ आदमी , तुमने मुझसे पिछली बार धोखा किया । मेरा भाग तो कोई भी मोल लेने को तैयार न हुआ।

नबीरा बोला - मालिक तुमने फसल का जो भाग सागा . वह अगर मैने न दिया हो तो मैं बेईमान हूं । मगर तुम्हारा माल न बिका तो उसमें मेरा क्या कसूर।

यह बात सुनकर जिन बोला - अच्छा , तो जाने दो इस बात को , अबकी फसल में से मैं निचला भाग लगा । अगर यह मंजूर है तो जमीन जोतो । नहीं तो नहीं।

मालिक , चलो मुझे आपकी शर्त स्वीकार है । आप जिसमें खुश रहेंगे उसी में मेरी भी खुशी है ।

यह सुन जिन चला गया और नबीरा खेत में हल जोतने लगा । खेत तैयार हो गया लो उसमें अबकी बार नबीरा ने गेहूं बोए । समय पर फसल तैयार हो गई । गेहूं की बालियां सुनहली हो गई तो जिन साहब आन धमके और बोले - बोलो , फसल कब काट रहे हो।

जी कल सुबह से शुरू करूंगा , नबीरा बोला , हां , आप स्वयं भी उपस्थित रहिए और अपना भाग वसूल कीजिए , नहीं तो आप मुझे फिर बेईमान समझेंगे।

दूसरे दिन नवीरा दरांती लेकर आया और बह जिन भी आ गया । उसने पहले बड़ी सफाई से ऊपर से गेह की बालिया काटी और उनको एक स्थान पर जमा किया । फिर उसने जड़ें और डंठल काटे और उनका एक स्थान पर ढेर लगाया । नबीरा अपनी फसल घर ले गया और जिन अपनी बाजार में बेचने को । पर वहां जड़ों और डंठलों का उसे कितना मिलता । वह बड़ा क्रोधित होकर बोला - अब की बार मैं देखूगा इस छोकरे को । जिन को अब यह विश्वास हो गया कि फसल में ऊपर का भाग और निचला भाग दोनों ही मूल्यवान है । अत : उसने दूसरी बार यही दो भाग लेने का निश्चय किया।

अबकी बार नबीरा जब हल लेकर पहुंचा तो जिन ने कहा - देखो जी , अबकी बार मैं ऊपर का और निचला भाग लूंगा । अगर यह शर्त तुम्हे मंजूर है तो हल जोतो । नहीं तो नहीं।

नबीरा ने कहा - मंजूर है मालिक | तो जिन चला गया । नबीरा ने अबकी बार खेत में मक्का बोई । खेत में खूब खाद और पानी दिया , तो उसकी फसल उत्तम हो गई । फसल काटने का समय आया तो जिन साहब आ गए और बोले - अबकी बार मैं स्वयं यहीं रहूंगा।

नबीरा और उसकी बीवी और अन्य सहायकों ने बड़ी सफाई से एक - एक करके मक्का के भुट्टे काटे और ढेर कर दिया । जब वह अपनी फसल ले चुका तो जिन से कहा - अब आपका ऊपर वाला और निचला भाग शेष है । इसे ले जाइए । उसने मक्का के पौधों को जड़ों सहित उखड़वा कर एक भारी ढेर लगवाया।

उसी समय एक व्यापारी वहां माल मोल लेने आया । नबीरा के मोटे - मोटे भुट्टे देखकर उसने उन्हें अच्छे दाम देकर मोल लिया । जिन ने , जो मनुष्य के रूप में था , उसे अपना भाग भी लेने को कहा तो वह बोला - अरे मूर्ख , मैं अनाज का व्यापारी हूं । यह घास तुम अगर मुफ्त में भी दोगे तो भी न लूंगा । यह कहकर खिलखिला कर हँसता हुआ चला गया।

खेत पर जब केवल जिन और नबीरा रह गए तो जिन क्रोध में आकर बोला - अरे ओ कमीने मनुष्य , तुम मुझसे यों धोखा करते हो । असल में तुम बुरे हो । खैर आगे देखूगा।

नबीरा ने अपनी दरांती उसकी ओर ऐसे दिखाते हुए , जैसे वह उसका सिर काटने को हो , कहा - देखो मूर्खातिमूर्ख जिन ! इस शस्त्र को । इससे मैं अभी तुम्हारा सिर कलम करूंगा । तू अपने को बड़ा समझता है । अरे क्या तूने आज तक मुझ ' कुजिन ' का नाम कभी न सुना था ?

जिन घबड़ा कर बोला - अरे भाई वह कौनसी आफत होती है..क्या कहा कुजिन , कुजिन ....

हां कुजिन ! कुजिन मैं हूं । इस नाम को अब याद रखो और देखो अगर फिर कभी मेरे सामने आने की सोची तो तुम्हारी खैर नहीं । अपना बोरिया - बिस्तर बाल - बच्चे लेकर यहां से भागो । नहीं तो मुझसे बुरा कोई न होगा - नबीरा ने धमकाते हुए कहा।

जिन की टांगे थरथरा रहीं थीं । वह बोला - माफ करो कुजिन , मैं अभी चला । मैं अब आपके सामने से गुजरने का कभी नाम न लूंगा । कह कर बह वहां से भागा।

उसके बाद नबीरा आनन्द का जीवन व्यतीत करने लगा । इस कहानी के आधार पर कश्मीरी भाषा का मुहावरा , ' जिनसे कोजिन ' ( जिन को कोजिन टकरा ) बना है।

 

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