ब्रांद कन्य या दहलीज़ की सिल कश्मीर में मकान तीन मजिला , चार मंजिला होते हैं । इन मकानों के प्रवेश द्वार धरती से एक फुट से तीन फुट तक ऊचे ...
ब्रांद कन्य या दहलीज़ की सिल
कश्मीर में मकान तीन मजिला , चार
मंजिला होते हैं । इन मकानों के प्रवेश द्वार धरती से एक फुट से तीन फुट तक ऊचे
होते हैं । इसलिए द्वार तक पहुंचने के लिए दो - तीन सीढ़िया बनी होती है जो पत्थर ,
ईट
गारे की बनी होती हैं और उन पर समतल पत्थर के मिल बिछे रहते हैं । इस सीढ़ी को
कश्मीरी भाषा में ' ब्राद कहते हैं और पत्थर की सिल को ' कन्य
' । सो ' बाद कन्य को दहलीज की मिल कहा जाएगा । इसके नाम
के संग एक कश्मीरी मुहावरा बना है जो यो है— बाद कन्य दरअ
आसन्य ' अर्थात ' दहलीज की मिल का दृढ़ होना । इस मुहावरे के
पीछे एक कहानी है । लीजिए उसे सुनिए-
बात बहुत पुराने जमाने की है । न मालूम
किस जमाने की . और न ही वह आदमी जिसने यह कहानी आज से लगभग 50 वर्ष
पूर्व मुझे सुनाई थी . कोई निश्चित समय बता सका था । कश्मीर के एक भाग में एक राजा
राज करता था । पुराने जमाने में हर एक नगर पर अलग - अलग राजा राज करते थे । चाहे
वह नगर कितना ही छोटा क्यों न होता , पर वह भी एक राज कहलाता था । खैर इस
राजा का एक ही बेटा था । वह बड़ा गुणी और बुद्धिमान था । जब वह जवान हो गया तो
राजा को उसके विवाह की चिन्ता लगी । पास पडोस के राजा भी उसके पास अपनी - अपनी
बेटियों के रिडते का सन्देश भेजते रहे । पर राजा किमी को हा या ना नहीं कहता था ।
कारण यह था कि राजकुमार विवाह करने पर राजी ही न था । वह पूछने पर यही कहता था -
पिताजी , जल्दी क्या है । मुझे विवाह करना तो है , पर अभी नहीं ।
कुछ सोच - विचार कर कर लूंगा ।
एक दिन राजा जब अन्य राजाओं के पैगामों
से परेशान हो गया , तो उसने कुमार को अपने पास बुला कर पूछा - बेटा
, तुम अब नौजवान हो । यही उम्र विवाह करने की होती है । अमुक राजा ने
मुझे इसी गर्ज से निमत्रण दिया था । मैं राजकुमारी को देख आया है । अच्छी लड़की है
। तुम हा भरो तो मैं उन्हें सूचित करके शुभ घड़ी पर तुम्हारा विवाह रचाऊं ।
राजकुमार ने यह सुना तो बोला - पिताजी ,
आपका
कहना सिर आखो पर । पर मैं अपनी मर्जी से ठीक तरह से लड़की को परख कर विवाह करना
चाहता । बह लाइकी , जिसे मैं बीबी बनाऊंगा . अगर मेरे स्तर पर खरी
उतरेगी तो चाहे वह किसी गरीब घर की ही बेटी क्यों न हो , मैं उसे ही अपनी
रानी बनाऊंगा । समय एक - सा नही रहता । पति - पत्नी का सम्बन्ध जीवन भर के लिए है
। ये जीवन की गाड़ी के दो पहिए होते है । यदि एक संगिनी का चुनाव परख कर करना चाहता हूं । यदि आप स्वीकार
करें तो मैं आज ही खोज करने के लिए देश - देशान्तर भ्रमण करने को निकलूंगा । पर , आप मेरे इस रहस्य को किसी से न कहिए ।
यह बात राजा की समझ में आ गई । उसने
खुश होकर उसकी बात मानते हुए कहा - अच्छा तो जाओ बेटा ईश्वर तुम्हारी मनोकामना
पूर्ण करे । वह लड़की जिसे तुम पसन्द करोगे चाहे कोई भी हो मुझे भी स्वीकार होगी ।
तुम्हारी खुशी में मेरी खुशी है ।
पिता की आज्ञा पाकर राजकुमार दूसरे दिन
प्रात काल ही उठा , शाही
ठाठ की पोशाक को उतारा और एक साधारण नागरिक के कपड़े पहन कर महल से चल दिया । वह
सूर्य चढ़ते ही एक चश्मे पर पहुंचा वहां एक चिनार के पेड़ के नीचे विश्राम किया और
स्वस्थ होकर फिर आगे को बढ़ा । दोपहर का समय था उसे रास्ते में अधेड़ उम्र का एक
पथिक मिला । दोनों ने एक दूसरे को प्रणाम किया और उस आदमी राजकुमार से पूछा - आप
कौन हैं । कहां से आए हैं और कहां जा रहे हैं ?
सुनकर राजकुमार बोला - मेरा नाम
लक्ष्मीपति है , दूर
देश से आया हूं । एक घुमक्कड हूं और अपना भाग्य परखने के लिए भ्रमण कर रहा हूं ।
जहां रात हुई , वहीं
रुका । कई सालों से घर से निकला हुआ हूं । हां अब यह बताएं कि आपका नाम , और शहर कौनसा है ?
सुनकर वह आदमी बोला - मेरा नाम सुधाकर
है । यहां से दस मील की दूरी पर एक छोटा - सा गांव है । मैं वही का निवासी हूं ।
शहर किसी काम से गया था । अब लौट रहा हूं , क्योंकि घर में एकमात्र पुत्री अकेली है । वह प्रतीक्षा कर रही होगी
। चलिए , आज रात आप हमारे
गांव में ही रुकिए ।
साहब , घुमक्कड़ को क्या ?
जहां भाग्य ले चले वहां चल दिया । चलिए आप ही के साथ हो लेता हूं कह
कर वे दोनों एक साथ हो लिए ।
वे अभी कुछ दूर ही चले थे कि सामने एक
पहाड़ी आई । उस पर वे चढ़ने लगे तो राजकुमार बोला महाशय , थकावट - सी अनुभव हो रही है । इसे दूर
करने के लिए कुछ सहारा दीजिए ।
सुधाकर ने यह शब्द सुने तो झट से एक
पेड़ से मोटी सी टहनी तोड कर ले आया और लक्ष्मीपति के हाथ में देकर बोला - लीजिए , यह सहारा , और हिम्मत न हारिए ।
उसने टहनी तो हाथ में ली , पर बोला - महाशय , यह पथ का सहारा नहीं होता । बड़े भोले
हो आप अच्छा , चलिए
पहले मैं ही आपको सहारा देता हूं ।
यह कहकर उसने एक कहानी सुनाना प्रारम्भ
किया , और वे दोनों बिना थकान महसूस किए उस पहाड़ी को पार कर गए , तो
सामने एक गांव नजर आया । इसे देखकर सुधाकर बोला - यह देखिए सामने जो गांब दिखाई
देता है , उससे अब कुछ ही मील की दूरी पर मेरा गांव है । आशा है हम सायंकाल
होते - होते वहां पहुंच जाएंगे ।
बातें करते - करते वे दोनों उस गांव की गलियों में से गुजरने लगे । वहां के लोगों ने उन्हें देखकर इधर उधर मुंह फेर लिए और वे आगे बढ़ते गए । वे गांव से बाहर निकले तो राजकुमार बोला - वाह ! वाह । कितना सुन्दर श्मशान था यह ?
सुधाकर यह सुनकर ठिठककर बोला - साहब ,
यह
श्मशान नहीं , एक बड़ा गांव है । आप क्या कहते हैं यह ! किसी
ने सुन लिया तो वह क्या कहेगा ।
हां , साहब , आपको
यह गांव दिखता है , पर मुझे तो यह श्मशान ही लगता है । राजकुमार ने
उत्तर दिया ।
इतनी देर में वे एक श्मशान पर पहुंचे ।
वहां पर एक कुटिया थी । उसमें से एक आदमी ने ज्योंही इन पथिकों को देखा तो बाहर
आकर आवाज़ दी - मित्रो , आप कहां से आ रहे हैं , कहां
जाना है ? थके हारे लगते हैं आप । आइए , थोड़ी देर
विश्राम कीजिए । फिर कुछ खा - पी कर आगे यात्रा शुरू करिएगा । बहुत दिन बाकी है ।
वह आदमी उन्हें यह कह कर कुटिया में ले गया । उनको खिलाया पिलाया और फिर हाथ जोड़
कर विदा किया ।
जब वे आगे चले तो राजकुमार बोला - कैसे
सुन्दर नगर में से अभी हम गुज़रे हैं । जी चाहता है कि इस नगर की प्रशंसा के पुल
बांधूं ।
सुधाकर ने यह शब्द सुने तो मन ही मन
में सोचने लगा कि यह आदमी पूरा पागल नहीं सही , पर मूर्ख जरूर
है । नगर को श्मशान और श्मशान को बस्ती बताता है । कैसा आदमी है यह ! पर वह लक्ष्मीपति
से कुछ न बोला । और वे दोनों आगे को चले । चलते - चलते सायंकाल के समय , जब
वे सुधाकर के मकान के पास पहुंचे तो उसने कहा- लक्ष्मीपति जी , अब
आप और मैं दोनों थके हारे
हैं । रात भी हो रही है । आइए ,
आज रात हमारी ही कुटिया में काट कर हमें आतिथ्य का सौभाग्य प्रदान
कीजिए ।
राजकुमार ने हँस कर उत्तर दिया - यदि
आपकी यही इच्छा है तो मुझे भी स्वीकार है । हां . पहले आप घर में जाकर पता कीजिए
कि क्या आपकी ' बाद
कन्य ' मजबूत है ।
यह बात उसकी समझ में तनिक भी न आई । वह
भाग कर घर के अन्दर गया और अपनी बेटी से , जिसका नाम लक्ष्मी था , बोला - बाहर एक अजीब सा आदमी मेरे साथ आया है । उसने नगर को श्मशान
और श्मशान को नगर बताया , और
अब मैने जब अन्दर आने और रात भर रुकने का निमन्त्रण दिया तो बोला , पहले अन्दर से पूछ तो आइए कि क्या बाद
कन्य मजबूत है ?
लक्ष्मी ने
मुस्करा कर उत्तर दिया - पिता जी ,
आप उस अतिथि से जाकर कहिए , हां , हमारी
दहलीज का पत्थर मजबूत है । आप अन्दर आइए ।
सुधाकर यह सुनकर बाहर आया और राजकुमार
से बोला - महाशय , आप
अन्दर आइए । हमारी दहलीज का पत्थर मजबूत है
यह उत्तर सुनकर राजकुमार मन ही मन कुछ
सोचता हुआ घर में गया । वहां घुसते ही उसकी पुत्री लक्ष्मी ने उसका आतिथ्य उत्तम
ढंग से किया । चाय कुलचे से उनकी भूख का कुछ निवारण किया , और स्वयं रसोई में शाम का साग - भात
पकाने के लिए चली गई ।
एकान्त पाकर राजकुमार ने सुधाकर से
पूछा - महाराज , आपको
अन्दर आने पर मेरी बात का उत्तर किसने बताया था?
उसने हँसकर कहा - साहब , मेरी इतनी समझ कहां कि मैं इन पेचदार
बातों को समझ सकता , मेरी
इसी पुत्री ने मुझे वैसा कहने को कहा था । क्या करू , बेचारी गरीब की पुत्री है । मा मर चुकी
है । गरीबी के कारण और योग्य वर न मिलने के कारण विवाह नहीं कर पाता । यही मेरी
समस्या है ।
खाना तैयार हुआ तो लक्ष्मी ने खाना
परोसा । स्वयं अतिथि के सम्मुख खड़ी रह कर बार - बार पूछती रही - कहिए और क्या चीज
ले आऊं । उसने राजकमार का वह आतिथ्य किया कि उसका मन मोह लिया । उसकी चतुराई का तो
उसे परिचय मिल ही गया था । उसके रूप लावण्य में भी कमी न थी । राजकुमार ने अपने मन
में यह निश्चय किया कि मैं इसे ही अपनी बीवी बनाऊंगा । जब लक्ष्मी काम - नाज से निवृत्त होकर , सोने के कमरे में विछौने बिछा चुकी तो
राजकुमार और सुधाकर सोने के कमरे में चले गए । उसी समय राजकुमार बोला - लक्ष्मी जी
, तुम्हारे पिता
तो हमारी बातों को समझ ही न पाए । मुझे खुशी है कि तुमने इनकी उलझन को अन्त में
दूर किया।
यह सुन लक्ष्मी ने पिता से वे प्रश्न
फिर पूछे जो राजकुमार ने उससे पूछे थे । और फिर एक - एक करके उनके उत्तर यो दिए
जिन्हें राजकुमार सुनता गया
पिताजी जब अतिथि महोदय ने आपसे रास्ते
का सहारा मांगा था , तो
आपको कोई कहानी शुरू करनी चाहिए थी । लकड़ी तो बुढ़ापे का सहारा होती है । पथ का सहारा
तो कथा - कहानी होती है ।
और इन्होंने नगर को श्मशान इसलिए बताया
क्योंकि वहां के आदमी इतनी अक्ल नहीं रखते कि बटोहियों की अन्न - जल से सेवा करें
। जहां आपको खाना - पीना न मिले वह श्मशान नहीं तो और क्या है?
और इनका यह प्रश्न कि क्या आपके घर की
दहलीज का पत्थर दृढ़ है . यह अर्थ रखता था कि क्या आपको घर - गृहस्थी को चलाने
वाली मालकिन बुद्धिमान तथा अतिथि सत्कार के धर्म को समझती है ।
अपने प्रश्नों के उत्तर सुनकर राजकुमार
ने मन में खुश होकर मोचा - जिस तरह की जीवन संगिनी की खोज में मैं चला था . वह मझे
मिल गई है । अब क्यों न मैं इसके पिता मे साफ - साफ कह दू ।
यह सोच वह सुधाकर से बोला - आदरणीय
मुधाकर जी , आपकी पुत्री तो सचमुच ही लक्ष्मी है । यदि आपको
मंजूर हो तो आप इसका विवाह मुझ मे कर दीजिए , ताकि इसे पाकर
मैं सचमुच ही लक्ष्मीपति हो जाऊ । कह कर उसने अपने राजकुमार होने और अपनी मर्जी से
विवाह करने की कहानी सुनाई ।
सुधाकर भला राजकुमार के प्रस्ताव को
कैसे न मानता . वह बोला - राजकुमार , इसे आपसे उत्तम पति कहां मिलेगा ,
परन्तु
हम तो गरीब हैं । यही एक दुविधा है ।
राजकुमार ने उत्तर दिया - वाह साहब वाह
गम्भवतः आपने मेरी कहानी को ध्यान से नहीं सुना है । मुझे जो स्वीकार होगा ,
वही
मेरे पिताजी को भी स्वीकार है । आपकी पुत्री धन दौलत के मामले में गरीब भले हो हो ,
पर
वह रूप तथा गुणों में तो धनवान है । और वही धन उत्तम धन है ।
सुधाकर ने हा भरी तो राजकुमार उस गत
वही रहा । दूसरे दिन वह अपने घर लौटा और अपने पिता से सारी बात कह दी । राजा ने
शुभ दिन तय करके लक्ष्मी के पिता को लिख भेजा और फिर राजकुमार लक्ष्मी को शादी कर
अपनी रानी बना कर ले आया ।
इस प्रकार वह गुणवती गरीब लड़की उस देश की रानी बन गई ।

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