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बड़शाह का न्याय

बड़शाह का न्याय आज से पांच सौ साल पहले कश्मीर पर एक सुलतान राज करता था । उसका नाम सुलतान जैन उल - अबदीन था । वह क्या हिन्दू क्या मुसलमान स...

बड़शाह का न्याय

आज से पांच सौ साल पहले कश्मीर पर एक सुलतान राज करता था । उसका नाम सुलतान जैन उल - अबदीन था । वह क्या हिन्दू क्या मुसलमान सबको एक समान समझता था । इस महान सुलतान की विलक्षण बद्धि और न्यायप्रियता के कारण लोग उसे ' बड़शाह ' अर्थात बड़ा बादशाह कहते थे , और अब इनका यही नाम प्रसिद्ध है।

उसी के शासन काल की बात है कि एक कश्मीरी सरदार ने एक के बाद एक दो विवाह किए । कुछ समय गुजरने पर उसकी दूसरी बीवी ने एक बालक को जन्म दिया । घर में खुशियां मनाई जाने लगी । परन्तु घर का स्वामी , दूसरी बीवी के बच्चा होने पर भी अपनी पहली बीबी को ही अधिक आदर और प्यार देता रहा । इस पर उसकी दूसरी बीवी हमेशा कुढ़ती रहती । वह अपनी बड़ी सौतन से बदला लेने और इस काटे को सदा सर्वदा के लिए निकाल फेकने की तदबीरें सोचती रहती । मनुष्य का मन जब ईर्ष्या , द्वेष तथा क्रोध की आग से जल उठता है , तो वह नीच से नीच काम करने पर तैयार हो जाता है । वह पशु से भी बुरा काम कर बैठता है । सो इस औरत ने भी इसी भावना में बहकर एक दिन जब उसका पति घर से बाहर गया हुआ था , रात के समय अपने ही पुत्र का गला दबोच कर उसको मार डाला । जब वह मर गया तो उसने चिल्ला - चिल्ला कर रोना शुरू किया - हाय री ! सौतन तुम्हारे बदन को कोढ़ खाए , तूने मेरे पुत्र का वध किया । हाय मेरी किस्मत फूटी । इत्यादि।

रोना - धोना सुन कर मुहल्ले के लोग उसके मकान में एकत्र हुए । मरे हुए बच्चे को देख कर त्राहि ! त्राहि करते गए और उससे इसकी मौत का कारण पूछा । उस डायन ने सौतन का नाम लेकर उसे कोसना शुरू किया । लोगों में से किसी ने मरे बच्चे को उठाया और उसी समय काजी के पास पहुंच कर दुहाई दी । सरकारी कारिंदों ने बेचारी बेगुनाह औरत को पकड़ कर हाजिर किया । काजी के पूछने पर उसने ' अल्लाह तअला और कुराने करीम ' की कसमें उठा - उठा कर कहा कि मैंने यह गुनाह नहीं किया है । पर काजी साहब कुछ न समझ पाए और उस बेचारी को कैदखाने में डलवा दिया । दूसरे दिन अदालत हुई तो काजी साहब ने इस मुकदमे को राजधानी के बड़े काजी की अदालत में पेश करने की आजा दी।

शहर के बड़े काजी के पास मुकदमा पहुंचा तो वहां भी उस डायन की ही बात परवानबढ़ी और बेचारी सौतन को अपराधी ठहराया गया । उसे मौत की सजा होनी थी इसलिए काजी साहब ने मिसल बादशाह सलामत के पास अन्तिम निर्णय के लिए भेज दी।

बड़शाह के पास मुकदमा गया तो उन्होंने सबसे पहले मुद्दई औरत को दरबार में हाजिर होने की आज्ञा दी । जब वह दरबार में हाजिर हुई तो बड़शाह ने उसे एकांत में ले जाकर पूछा - बहन , सच बता बच्चा क्योंकर मरा है।

जब उसने सौतन के नाम की ही रट लगाई तो बड़शाह ने कहा - अगर तुम सच्ची हो , तो तुम्हें इस बात को सिद्ध करने के लिए यह करना होगा कि तुम्हें यहीं पर अपने कपड़े उतार कर नंगी होकर दरबार और शहर से गुजरते हुए अपने निवास स्थान पर जाना होगा । कहो मंजूर है यह ?

उस डायन के दिमाग पर बदले की भावना का इतना जनून चढा था कि वह बोली सलामत , मुझे यह शर्त मंजूर है । कह कर वह अपने कपड़े उतारने को तैयार हो गई । परन्तु बादशाह ने उसे रोका और अपने पीछे - पीछे दरबार में आने को कहा । जब वे दरबार में पहुंचे तो मुलजिम ( अपराधी ) औरत को पेश करने की आज्ञा दी । वह बेचारी , अधमरी सी शरम से पसीना - पसीना होती हुई आंखें नीचे किए हए दरबार में आई , तो सुलतान उसे भी लेकर एकान्त में उसी कमरे में गया । वहां पहुंच कर उसको भी वही आज्ञा दी जो उसकी सौतन को दी थी । पर वह बेचारी शीलवान औरत थर - थर कांपती हई रोती बोली शहनशाह , प्रजा पालक , मैंने यह गुनाह नहीं किया है । मैं इस प्रकार नंगी होने के बदले मौत का आलिंगन करने को तैयार हूं , पर शरम और शील को नहीं छोडूगी । यह कहकर वह जोर - जोर से रोने लगी।

बादशाह ने उसे सांत्वना देते हुए कहा - चलो बेटी , तुम निर्दोष सिद्ध हुई हो । चलो दरबार में । वे दरबार में आए । बड़शाह तख्त पर बैठे और यो आज्ञा दी - यह औरत जिसे आप लोग कातिल समझते हैं निर्दोष है । शील और गुण की खान है । दोष उसका है जिसने इसको तबाह करने की नियत से अपने ही पुत्र को मार डाला है । फिर उस औरत की ओर दिखा कर आज्ञा दी , इसे तब तक यहीं पर कोडे लगाते जाओ जब तक यह सच न कहे।

एकदम दो सरकारी नौकर हाथों में कोड़े ले कर आए और उस पर तडातड़ कोड़े बरसाने लगे । वह दृष्टा कुछ समय तक तो वही रट लगाती रही , पर अन्त में उसने सब बात साफ - माफ सुना दी । उसे कारागार में डाला गया और वह अपने दुष्कर्म का फल भोगने लगी । सभी लोग बड़शाह की विलक्षण बुद्धि और न्याय की प्रशंसा करने लगे।

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