उपकार का इनाम बात बहुत पुरानी है , न जाने कब की । एक गांव में एक विधवा रहती थी । उसका पति धनवान था और मरने पर एक अच्छी - खासी रकम छोड़ गया...
उपकार का इनाम
बात बहुत पुरानी है , न
जाने कब की । एक गांव में एक विधवा रहती थी । उसका पति धनवान था और मरने पर एक
अच्छी - खासी रकम छोड़ गया था । इस विधवा के कोई सन्तान न थी । परन्तु वह दयालु
स्वभाव की थी । उसके पास जो कोई भी आता वह खाली हाथ न जाता था । वह दीन , दुखियों
और बीमारों की हर तरह से मदद करती थी । उसकी दया मनुष्यमात्र तक ही सीमित न थी ,
बल्कि
वह पशु - पक्षियों का कष्ट भी सहर्ष दूर करती थी।
एक दिन वह अपनी बाड़ी में टहल रही थी ।
वहां उसने एक घायल पक्षी को जमीन पर औंधा पड़ा देखा । उसका एक पंख , न
मालूम कैसे टूट गया था । वह दर्द से फड़फड़ा रहा था । उसे सर्दी भी लग रही थी।
उसने फिर से बही पांच शिक्षाएं राजा को
भी सुनाई और चुप हो गया । कुछ समय तक दरबार में सन्नाटा छाया रहा । राजा भी कुछ
देर तक यही सोचता रहा कि यह तो मूर्खता की बातें हैं , पर इन को
आज़माने में क्या हर्ज है।
फिर कुछ दिनों बाद , राजा
ने रानी को मायके रवाना किया और यह घोषणा की कि वे भी स्वयं एक गोपनीय यात्रा पर
प्रस्थान कर रहे हैं । एक रात के अधियारे में , राजा ने भिखमंगे
के फटे - पुराने कपड़े पहने , और महल से निकला । परन्तु उस आदमी की
शिक्षा के अनुसार उसने अपनी कमरबंद में सात बहुमूल्य रत्न भी छिपा कर रख लिए।
भिखमंगे के रूप में यह राजा घूमते -
फिरते सीधा अपनी बहन के दरवाजे पर पहुंचा और पेट भरने को कुछ भोजन और सिर छिपाने
के लिए जगह देने की प्रार्थना की । वह एक निकटवर्ती राजा की रानी थी । जब उसने
अपने भाई की दुर्दशा देखी , तो वह आश्चर्यचकित हो कर बोली - भाई ,
तुम
अपना सत्यानाश तो कर बैठे हो । क्या अब मुझे भी बदनाम करने यहां आए हो ? मुझे
अपने पति के सामने लज्जित न करो । अपना बोरी बिस्तरा उठाओ और यहां से चले जाओ।
सुनकर फकीर का छपवेशधारी राजा बोला —
बहन
! मां की जाई बहन , जरा तरस खाओ अपने भाई की हालत पर । मैं भूखा
हूं ! मुझे घर में आश्रय नहीं देना चाहती तो भी एक दया तो करो । मेरे लिए धर्मशाला में
कुछ खाना तो भेज दो । मैं आपके निकट रहकर आपको लज्जित नहीं करूंगा । अपनी इस दया
के सबूत के रूप में उस थाल पर अपनी मुहर जरूर लगाना , बहन।
कह कर वह वहां से जल्दी से भागा।
जब इस शाही फकीर के पास बहन का भेजा
हुआ थाल पहुंचा तो वह एकांत में थाल उठाकर ले गया । उसने भोजन तो वहीं पक्षियों के
लिए बिखेर डाला और उस थाल को वहीं जमीन खोद कर दबा दिया । उसके बाद उसने फिर से
अपनी यात्रा शुरू की।
इस घटना के दो दिन बाद शाही फकीर सीधा
अपने एक पुराने मित्र के घर पर पहुंचा । उसने दरवाजे पर दस्तक दी , तो अन्दर से उसका मित्र आया । बाहर आते
ही उसने अपने मित्र को पहचाना । बिना कुछ कहे सुने वह उसकी ओर बढ़ा और उसे कस कर
गले लगा लिया । वह उसे अपने घर ले आया । उसने राजा को अपने हाथों से पानी लाकर
दिया और स्नान करवाया । उसके बाद अपनी पोशाक में से एक नया जोड़ा पहनवाया और फिर
उत्तम भोजन करवाया । रात को नरम से नरम बिछौने पर सुलाया । वह मित्र मन ही मन राजा
की इस दशा पर दुखी हुआ , पर
जबान से उसने कुछ न पूछा।
दूसरे दिन प्रातःकाल ही राजा उठा और
चलने की तैयारी की । उसके मित्र ने उसे रोकने की कोशिश की , पर वह न माना और मुंह अधेरे वहां से
फिर अपने घुमक्कड़ जीवन का आनन्द लेने को चल दिया । रास्ते में चलते - चलते वह उस
आदमी की बातों का मनन करते हुए बोला - सच्चा मित्र दुख में भी साथ नहीं छोड़ता।
अब राजा सीधा अपनी ससुराल पहुंचा , जहां उसने रानी को पहले से ही रहने को
भेजा हुआ था । यहां वह ससुर के घुड़साल के रक्षक के पास नौकर हो गया । वह आदमी
जितना सुन्दर था उतना ही उसका दिल काला था।
कुछ दिन नौकरी करने के बाद राजा ने वह
दृश्य देखा , जिसे
देख उसके दिल में ठेस सी लगी । उसने आधी रात को राजकुमारी अर्थात अपनी रानी को इस
तबेले के स्वामी के घर में आते देखा । वह पत्थर का सा दिल बना कर उस कमरे के द्वार
से कान लगाकर सुनने लगा , जहां
उसकी बीवी घुसी थी । उसने जब उसे बेले के स्वामी से प्रेम की बातें करते सुना तो
उससे न रहा गया , वह
आपे से बाहर हो गया । वह दरवाजे को धकेलकर अन्दर घुस गया । रानी ने भी फकीर के बाने
में अपने पति को पहचान लिया।
दूसरे ही क्षण रानी का शरीर थर - थर
कांपने लगा । जब उसके प्रेमी ने कारण पूछा तो वह बोली – बस अब मेरी खैर नहीं । वह आदमी जो
तुम्हारा नौकर है . मेरा पति है । ईश्वर सहायता करे । जल्दी करो , जल्लाद को बुलवा लो . और इसका सिर कटवा
दो । नहीं तो तुम और मैं दोनों मारे जाएंगे।
तबेले के स्वामी ने झट से राजा को पकड़
कर जल्लाद के हवाले किया , जो
उसे पास के ही जगल में कत्ल करने के लिए ले गए । राजा आखिर राजा ही तो था उसने
जल्लाद को इस बात पर राजी किया कि बह छ जवाहर लेकर उसे मुक्त कर दे । जल्लाद ने वह
धन लिया और राजा को जाने दिया । राजा भी सिर पर पांव रख कर वहां से भागा और मन में
उन पाच शिक्षाओं के सुनाने वाले की सराहना करता हुआ बोला - यह लो चार बाते तो
अक्षरश : सत्य सिद्ध हुई । यदि मेरे पास धन न होता तो इस समय मेरे शव को जगली
जानवर खा रहे होते । अब राजा विक्रमादित्य की पुत्री के पाने का यत्न करना आखिरी
बात है । दीखता है , वह
भी सत्य ही सिद्ध होगी।
कई महीनों के सफर के बाद वह एक दिन
राजा विक्रमादित्य के दरबार में पहुंचा । उस समय उसने संन्यासियों के पीतवस्त्र
धारण किए हुए थे । उसने राजा को सम्बोधित करके कहा - महाराज ! मैं यहा आपकी पुत्री
से विवाह करने के निमित्त हाजिर हुआ हूं ! यदि मैं उसे प्राप्त करने में सफल हो
गया तो मैं इन गेरुआ वस्त्रों का परित्याग करने को तैयार हूं।
राजा विक्रमादित्य व्यग्यात्मक हँसी
हँस कर बोला - संन्यासी महाराज ,
आपको क्या मालूम कि उसको प्राप्त करने के लिए आप कौनसा खतरा मोल ले
रहे हैं । आपसे पहले भी दर्जनों राजाओं ने उसे प्राप्त करने के यत्न किए हैं। पर
उसके शयनागार से उनका शव ही बाहर निकला है । आप भी अपना भाग्य परख कर देख लें और
यदि आप सचमुच ही सुबह तक जीवित रहे तो मैं आपका विवाह उससे करने को तैयार हूँ ।
अत रात पड़ने के साथ ही राजा को
राजकुमारी के शयनागार के अन्दर जाने की अनुमति मिल गई । राजकुमारी और वह आधी रात
तक बातें करते रहे । फिर धीरे - धीरे राजकुमारी की आंखें भारी हो गई और वह सो गई।
अब राजा अकेला ही जागता रहा , और वह नींद न आए इस बात की हरचन्द्र
कोशिश करता रहा । ऐसी रूपसी राजकुमारी को अपना बनाने के लिए वह नींद को ही क्या
हरेक बाधा को दूर करने का प्रण कर बैठा । इसी बीच उसके कानों में यह आवाज़ पड़ी -
खबरदार , होशियार।
यह सुन कर राजा ने बिजली की सी तेजी के
साथ अपने कपड़े उतारे , उनको
राजकुमारी के पास ऐसा बना कर रख दिया मानो कोई आदमी सोया हुआ है । वह स्वयं कमरे
के एक अंधेरे कोने में खड़ा हो गया।
उसके थरते हुए हाथों ने अनायास ही
तलवार के दस्ते को पकड़ा और वह एकटक पलंग की ओर ताकता रहा।
राजकुमारी के पंखुड़ियों से होठ धीरे -
धीरे खुले । फिर बह घटना घटी जिसे देख कर राजा चौंका । उसके होठों में से एक
जहरीला काला सांप निकल पड़ा । उसने आव देखा न ताव और एकदम से अपने जहरीले दांत
राजकुमारी के साथ लिटाए गए नकली आदमी में गड़ा दिए।
उसी समय राजा , हिम्मत करके उस
कोने से तलवार खींच कर कूदा , और उस सांप पर वार करके उसका सिर धड़
से अलग कर दिया और उसके सारे शरीर के टुकड़े - टुकड़े कर डाले । उसने इस दैत्य के
शरीर के सभी टुकड़ों को एक कपड़े में एकत्र करके उनकी पोटली बनाई और पलंग के नीचे
फेंक दी । उसके बाद वह थकावट मिटाने के निमित्त राजकुमारी के पास पलंग पर लेट गया।
दूसरे दिन प्रात : काल , पहरेदार
, नियमानुसार एक और शव को निकालने के लिए दरवाजे के पास आए और उसे
खटखटाया । अन्दर से जब संन्यासी रूपी राजा ने दरवाजा खोला , तो उनकी हैरानी
का ठिकाना न रहा।
आन की आन में यह खबर सारे महल में फैल
गई और राजा विक्रमादित्य भी स्वयं उस कमरे के द्वार पर आया । जब उसने संन्यासी से
रात भर की घटना का ब्यौरा सुना और पलंग के नीचे झाक कर सर्प के शव को देखा ,
तो
उसने इस राजा , यानी अपने भावी दामाद को गले से लगा लिया और
बोला - अब आप विवाह के लिए तैयार हो जाइए।
सन्यासी बस्त्रधारी राजा ने हाथ जोड़
कर विनती की - महाराज , अभी नहीं । मुझे अभी कुछ और फर्ज निभाने हैं ।
उन्हें निभाते ही मैं आपकी पुत्री से विवाह करने आऊगा । हां , फिलहाल
हम दोनों अपनी अंगूठियां बदल लेंगे । यह कह कर उसने अपनी अंगूठी राजकुमारी को पहना
दी और उसने भी उसे अपनी अंगूठी पहना दी । वह फिर वहां से चल दिया।
अपना कार्य पूरा करने के बाद राजा सीधा
अपनी राजधानी लौट गया । राज्य का शासन भार फिर से मंत्री को सौंप कर वह नौकर चाकर
लेकर फिर से चल पड़ा।
वह पहले वहीं गया जहां उसकी बहन थी ।
आज उसने उसका भव्य स्वागत किया । परन्तु वह उसकी दी हुई थाली साथ लाया था । उसने
उस थाली को लौटाते हुए कहा - लो बहन , यह तुम्हारा थाल मेरे पास संभाल कर रखा
हुआ था । उस थाल को देख वह उसके पाव पड़ कर और रो - रो कर माफी मांगने लगी।
उसके बाद वह अपने मित्र से मिलने गया ।
वह आज भी उसी तरह उसके गले लगा और बड़ा खुश हुआ कि उसे फिर अपना राज मिल गया है ।
राजा ने उसे अपनी कहानी सुनाई तो वह और भी प्रसन्न हो गया । राजा के आग्रह पर वह मित्र
भी इसके काफले में मिल गया।
फिर वह उस नगर में गया जहां उसकी दुष्ट
पत्नी अपने पिता के यहां रहती थी । वहां उसने अस्तबल के स्वामी की कहानी सबको
सुनाकर , उसे और बेवफा रानी को कारागार में डलवा दिया।
उसके बाद वह एक शानदार बारात लेकर
विक्रमादित्य के महल की ओर चला , वहां राजकुमारी से उसका विधिवत विवाह
हुआ और वह स्वदेश लौटा।
इस प्रकार उस आदमी की पांचों शिक्षाएं कसौटी पर कसे जाने पर सच साबित हुईं । उसे भी राजा ने अपना एक दरबारी नियुक्त किया।
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